मुझे भी कुछ कहना है
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रविवार, 2 मई 2021
सुना तुमने
सोमवार, 8 मार्च 2021
उदास मन
मन रह रह के
उदास हो जाता है ।
आज क्यों?
क्या कमी है
मेरे जीवन में,
कुछ भी तो नहीं
फिर चिंता किस बात की।
दृष्टिपात करती हूं
पूरे दिनचर्या पर,
क्या घटित हुआ
आज सोचती हूं।
आज क्यों?......
याद आया
मां का फोन आया था,
लड़ाई हुई थी भाई भाभी में
रात को सभी सो गए
भूखे पेट,
बेचारी को पागल बोला
भाई ने उसे जो
दो छोटे-छोटे बच्चों की मां
पूरे दिन उन में लगी रहती है,
ना कुछ बोलती है
ना मांगती है
गूंगी सी बनी रहती है ।
फिर भी पसंद नहीं इन मर्दों को
न बोलने वाली न
सुनने वाली,
औरत आखिर
बने तो बने कैसे
सत्ता पर बैठे सत्ताधीशो का
रोजगार चल रहा है ।
बेरोकटोक
और युवाओं को कुरौना के नाम
पर बेरोजगारी के गर्त में
धकेल कर,
कैसे सो पाते हैं
सबका घर उजाड़ कर।
सबका जड़ है बेरोजगारी
निठल्ला पन,
अपने ही घर में
एक औरत पर
अत्याचार होता है।
और मैं कुछ नहीं कर पाती
यही सोचकर
मन उदास हो जाता है
आज क्यों ?
नहीं बार-बार......
सोमवार, 25 मई 2020
रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृतियां
- विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा
- अद्वैत भावना
- सांकेतिक दांपत्य भावi
- महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति
- वेदना भाव
- सार्वभौम भावना
- प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
1.विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा----- रहस्यवादी कवि जब उस अनंत शक्ति के साथ अपनी आत्मा का संबंध स्थापित करने के लिए उन्मुख होता है तब ब्रह्मा की सत्ता के प्रति कौतूहल अथवा जिज्ञासा भाव प्रस्फुटित होता है । उसके विराट तत्व से अभिभूत वह उसे जानने की उत्कट अभिलाषा रखता है----- "तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी
देख लूं उस पार क्या है?
जा रहे जिस पंथ से युगकल्प
उसका छोर क्या है?"
2.अद्वैत भावना-----आधुनिक रहस्यवादी कविता में वेदांत के अद्वैत वादी दर्शन का माधुर्य पूर्ण वर्णन हुआ है । ब्रह्म जीव एक है तथा इस देह के भीतर ही ब्रह्म का निवास है। इसी देह में इसकी प्राप्ति हो सकती है। यह भाव है रहस्यवाद का---
"तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय का?
हारू तो खोऊंअपनापन
पाऊं तो प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूं तेरा ही बंधन"
3. संकेतिक दांपत्य भाव----- आधुनिक रहस्यवादी कवियों ने संकेतिक दांपत्य भाव में बांध कर निराले स्नेह संबंधों की सृष्टि कर डाली है----
" प्रिय चिरंतन है सजनी
छनछन नवीन सुहागिनी में!
4. महामिलन के पश्चात विरहनुभूती----- रहस्यवादी कवियों में मिलन की आकांक्षा ही नहीं मिलन के स्पष्ट संकेत भी मिलते हैं । उस महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति इनके काव्य में प्रचुरताके साथ मिलती है----
"ये सब स्फूलिंग है मेरी
उस ज्वाला मयी जलन के
कुछ शेष चिन्ह् है केवल
मेरे उस महामिलन के"
5. वेदना भाव----- रहस्यवादी कवियों ने दांपत्य संबंध का आधार लेकर रहस्यवाद के आधार रूप वेदना को अत्यंत मार्मिक बना दिया है । उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है---
" ठहरी बेसुध पीड़ा को
मेरी न कहीं छू लेना
जब तक वे आ न जगावे
बस सोती रहने देना"
6. सार्वभौम भावना---- रहस्यवादी कवियों की मूल प्रेरणा धार्मिक ना होकर माननीय एवं संस्कृतिक है। इन्होंने जीवन और जगत के विस्तृत क्षेत्र पर प्रकाश डाला है। महादेवी वर्मा की अधिकांश रचनाएं इसी सार्वभौम भावना की प्रतीक है--- "बिखर बिखर मेरे दीपक जल
मेरे विश्वासों से द्रुत तर
सुभग न बुझने का भयकर
मैं आंचल की ओट किए हूं।"
7. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा----रहस्य वादियों के अनुसार यह असीम प्राकृति उस विराट सत्ता की छाया है। पंत की प्रकृति संबंधी भावनाएं अत्यंत मार्मिक है----
" दूर उन खेतों के उस पार
जहां तक गई नील झंकार।"
8.प्रतीक विधान---- रहस्यवादी कवियों ने अपने भावा भिव्यंजना के लिए रूपकों या प्रतीकों की शरण ली है। वह अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को संसार की व्यवहारिक भाषा में व्यक्त कर पाए हैं।
"शब्दों के सीमित साधन से
उर के आकुलआराधना से
मन के उद्वेलित भावों का
कैसे रूप बनाऊं?"
स्पष्ट है कि रहस्यवाद प्रकृति में मानवीय भावों का दार्शनिक निरूपण है। जब हम प्रकृति में जड़ चेतन का एकीकरण दार्शनिक भाव भूमि में करते हैं तो रहस्यवादी भावनाओं की प्रक्रिया आरंभ होती है उसे ही रहस्यवाद कहा जाता है।
अनु की कलम से....
शनिवार, 23 मई 2020
रेखाचित्र किसे कहते हैं?
- रेखाचित्र गद्य साहित्य की एक विधा है। चित्रकला में जिस प्रकार रेखाओं के माध्यम से दृश्य या रूप को उभार दिया जाता है, उसी प्रकार जब साहित्य में शब्दों के माध्यम से दृश्य या रूप को उभारा जाता है तो उसे रेखाचित्र कहते हैं। इस पूरे उद्धरण में आधुनिक जीवन का एक हड़बड़ा या सा सदृश्य उभारा गया है । अखबार,नेता,मंत्री, अफ़सर, बैठ के आदि का पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है जिससे आधुनिक जीवन के स्वार्थ एवं पाखंड का पर्दाफाश हो जाता है।
इस प्रकार रेखा चित्र की प्रधान विशेषता रूप या दृश्य की प्रस्तावना है । सफल रेखाचित्र लिखने के लिए दृश्य की बाहरी और भीतरी विशेषताओं को ताड़ लेने वाली तेज दृष्टि आवश्यक है। रेखा चित्र में दृश्य, रूप या व्यक्ति वास्तविक होते हैं किंतु उनके चित्रण में कल्पना का उपयोग किया जाता है। रेखाचित्र कहानी की भांति लक्ष्यउन्मुख होता है। रेखाचित्र कहानी से भिन्न इस बात में होते हैं कि उनमें चित्रात्मक ता के माध्यम से ही सब कुछ कहना होता है।
इस विधा का आरंभ पंडित पद्म शर्मा के' पद्म पराग' से माना जाता है ।सन 1939 में हंस का रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के 15 साहित्यकारों पत्रकारों के रेखाचित्र प्रकाशित हुए। 1946 में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादक त्व में ' मधुकर' का रेखाचित्र विशेषांक निकला । अश्क की' रेखाएं और चित्र' हरिवंश राय की 'नए पुराने झरोखे'श्रीमती महादेवी वर्मा की 'अतीत के चलचित्र' नामक रेखाचित्र अपने विधान में पूर्ण है । रामवृक्ष बेनीपुरी की 'माटी की मुरतें' नामक रेखाचित्र की शैली जीवंत और स्फूर्ति दायक है ।
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अनुराधा
शुक्रवार, 8 मई 2020
गुरुवार, 30 अप्रैल 2020
शनिवार, 25 अप्रैल 2020
आंचलिक उपन्यासों में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।
नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
धन्यवाद
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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी यूं तो हिंदी आलोचना का सूत्रपात भारतेंदु युग में ही हो चुका था। किंतु हिंदी आलोचना मुख्यतः आचार्य महावीर प्र...
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