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सोमवार, 25 मई 2020

 रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृतियां


  1. विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा 
  2. अद्वैत भावना
  1. सांकेतिक दांपत्य भावi
  1. महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति 
  2. वेदना भाव
  3. सार्वभौम भावना
  4. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
8.प्रतीक विधान
1.विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा----- रहस्यवादी कवि जब उस अनंत शक्ति के साथ अपनी आत्मा का संबंध स्थापित करने के लिए उन्मुख होता है तब ब्रह्मा की सत्ता के प्रति कौतूहल अथवा जिज्ञासा भाव प्रस्फुटित होता है । उसके विराट तत्व से अभिभूत वह उसे जानने की उत्कट अभिलाषा रखता है----- "तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी

 देख लूं उस पार क्या है?
 जा रहे जिस पंथ से युगकल्प
उसका छोर क्या है?"

2.अद्वैत भावना-----आधुनिक रहस्यवादी कविता में वेदांत के अद्वैत वादी दर्शन का माधुर्य पूर्ण वर्णन हुआ है । ब्रह्म जीव एक है तथा इस देह के भीतर ही ब्रह्म का निवास है। इसी देह में इसकी प्राप्ति हो सकती है। यह भाव है रहस्यवाद का---
 "तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय का?
 हारू तो खोऊंअपनापन
पाऊं तो प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूं तेरा ही बंधन"
3. संकेतिक दांपत्य भाव----- आधुनिक रहस्यवादी कवियों ने संकेतिक दांपत्य भाव में बांध कर निराले स्नेह संबंधों  की सृष्टि कर डाली  है----
" प्रिय चिरंतन है सजनी
 छनछन नवीन सुहागिनी में!
4. महामिलन के पश्चात विरहनुभूती----- रहस्यवादी कवियों में मिलन की आकांक्षा ही नहीं मिलन के स्पष्ट संकेत भी मिलते हैं । उस महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति इनके काव्य में प्रचुरताके साथ मिलती है----
"ये सब स्फूलिंग है मेरी
 उस ज्वाला मयी जलन के
 कुछ शेष चिन्ह् है केवल
 मेरे उस महामिलन के"
5. वेदना भाव----- रहस्यवादी कवियों ने दांपत्य संबंध का आधार लेकर रहस्यवाद के आधार रूप वेदना को अत्यंत मार्मिक बना दिया है । उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है---
" ठहरी बेसुध पीड़ा को
 मेरी न कहीं छू लेना
 जब तक वे आ न जगावे
 बस सोती रहने देना"
6. सार्वभौम भावना---- रहस्यवादी कवियों की मूल प्रेरणा धार्मिक ना होकर माननीय एवं संस्कृतिक है। इन्होंने जीवन और जगत के विस्तृत क्षेत्र पर प्रकाश डाला है। महादेवी वर्मा की अधिकांश रचनाएं इसी सार्वभौम भावना की प्रतीक है--- "बिखर बिखर मेरे दीपक जल
 मेरे विश्वासों से द्रुत तर
 सुभग न बुझने का भयकर
 मैं आंचल की ओट किए हूं।"
7. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा----रहस्य वादियों के अनुसार यह असीम प्राकृति उस विराट सत्ता की छाया है। पंत की प्रकृति संबंधी भावनाएं अत्यंत मार्मिक है----
" दूर उन खेतों के उस पार
 जहां तक गई नील झंकार।"
8.प्रतीक विधान---- रहस्यवादी कवियों ने अपने भावा भिव्यंजना के लिए रूपकों या प्रतीकों की शरण ली है। वह अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को संसार की व्यवहारिक भाषा में व्यक्त कर पाए हैं।
"शब्दों के सीमित साधन से
 उर के आकुलआराधना से
 मन के उद्वेलित भावों का
 कैसे रूप बनाऊं?"

 स्पष्ट है कि रहस्यवाद प्रकृति में मानवीय भावों का दार्शनिक निरूपण है। जब हम प्रकृति में जड़ चेतन का एकीकरण दार्शनिक भाव भूमि में करते हैं तो रहस्यवादी भावनाओं की प्रक्रिया आरंभ होती है उसे ही रहस्यवाद कहा जाता है।
                                             अनु की कलम से....

शनिवार, 23 मई 2020

रेखाचित्र किसे कहते हैं?

  • रेखाचित्र गद्य साहित्य की एक विधा है। चित्रकला में जिस प्रकार रेखाओं के माध्यम से दृश्य या रूप को उभार दिया जाता है, उसी प्रकार जब साहित्य में शब्दों के माध्यम से दृश्य या रूप को उभारा जाता है तो उसे रेखाचित्र कहते हैं। इस पूरे उद्धरण में आधुनिक जीवन का एक हड़बड़ा या सा सदृश्य उभारा गया है  । अखबार,नेता,मंत्री, अफ़सर, बैठ के आदि का पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है जिससे आधुनिक जीवन के स्वार्थ एवं पाखंड का पर्दाफाश हो जाता है।

 इस प्रकार रेखा चित्र की प्रधान विशेषता रूप या दृश्य की प्रस्तावना है । सफल रेखाचित्र लिखने के लिए दृश्य की बाहरी और भीतरी विशेषताओं को ताड़ लेने वाली तेज दृष्टि आवश्यक है। रेखा चित्र में दृश्य, रूप या व्यक्ति वास्तविक होते हैं किंतु उनके चित्रण में कल्पना का उपयोग किया जाता है। रेखाचित्र कहानी की भांति  लक्ष्यउन्मुख होता है। रेखाचित्र कहानी से भिन्न इस बात में होते हैं कि उनमें चित्रात्मक ता के माध्यम से ही सब कुछ कहना होता है।
 इस विधा का आरंभ पंडित पद्म शर्मा के' पद्म पराग' से माना जाता है ।सन 1939 में हंस का रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के 15 साहित्यकारों पत्रकारों के रेखाचित्र प्रकाशित हुए। 1946 में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादक त्व में  ' मधुकर' का रेखाचित्र विशेषांक निकला । अश्क की' रेखाएं और चित्र' हरिवंश राय की 'नए पुराने झरोखे'श्रीमती महादेवी वर्मा की 'अतीत के चलचित्र' नामक रेखाचित्र अपने विधान में पूर्ण है । रामवृक्ष बेनीपुरी की 'माटी की मुरतें'  नामक रेखाचित्र की शैली जीवंत और स्फूर्ति दायक है ।
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 अनुराधा

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

जीवनी साहित्य

जीवनी साहित्य गद्य परंपरा की उत्कृष्ट विधा है। हिंदी में आधुनिक काल में बड़ी संख्या में जीवनिया लिखी गई हैं। कुछ विद्वान जीवनी और आत्मकथा को एक ही विधा के अंतर्गत स्वीकारते हैं किंतु दोनों भिन्न हैं। जीवनी अन्य के द्वारा तथा आत्मकथा स्वयं के द्वारा लिखी जाती है।

 भारतेंदु युग से ही जीवनी साहित्य का उद्भव माना जाता है। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ जीवनिया मिलती हैं। कुछ विद्वानों ने कार्तिक प्रसाद खत्री द्वारा लिखित "मीराबाई"(1899) को हिंदी की प्रथम साहित्यिक जीवनी माना है । भारतेंदु युग में देवी प्रसाद मुंसिफ का नाम जीवनी लेखकों में विशेष लिया जाता है।जो जीवनी लिखी गई उसमें प्रमुख समाज सुधारक श्री भद्दयानंद सरस्वती पर लिखी गई जीवनिया ही प्रमुख है। भारतेंदु युग से जीवनी विधा का आरंभ और दिवेदी युग इसका सही अर्थों में परिष्कार स्वीकारना उचित होगा।

 डॉ पदम सिंह शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद तथा निराला पर लिखित जीवनी को उत्कृष्ट जीवनी माना है। प्रेमचंद की जीवनी "कलम का सिपाही" नाम से उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है । दूसरी जीवनी के लेखक हैं रामविलास शर्मा नाम है "निराला की साहित्य साधना "इसीप्रकार विष्णु प्रभाकर कृत "आवारा मसीहा" शीर्षक से शरद चंद की जीवनी और भगवती प्रसाद कृत मनीषी की लोक यात्रा" में गोपीनाथ कविराज की जीवनी भी प्रकाशित हुई है, जिन्हें जीवनी साहित्य जगत के उज्जवल कीर्ति स्तंभ मान सकते हैं जो युग युग तक उदीप्त होकर जीवनी लेखकों के पथ को आलोकित करते रहेंगे।

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में जीवनी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। जीवनी लेखन में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। यह नवीन साहित्य गद्य विधाएं पृथक होते हुए भी अनेक बार एक दसरे की पूरक प्रतीत होती है।

मंगलवार, 10 मार्च 2020

हिंदी कहानी का उद्भव और विकास

                        हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
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हिंदी कहानी का वास्तविक समारंभ कब हुआ यह विषय आज भी विवादास्पद है। वैसे कहानी सुनने सुनाने की परंपरा का वास्तविक प्रारंभ द्विवेदी  युग'सरस्वती' पत्रिका(1900)  से मान्य है
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ श्रीकांत लाल और डॉक्टर गणपति चंद्र गुप्त ने इंदुमती कहानी को प्रथम मौलिक कहानी स्वीकार किया है।हिं
कहानी के विकास को तीन भागों में बांट सकते हैं 
क़) पूर्व प्रेमचंद युग ( सन उन्नीस सौ से 1916 तक)
ख) प्रेमचन्द युग ( सन 1916 से 1936 तक )
ग) उत्तर प्रेमचंद युग(सन 1936 से 1950 तक) 1990 में इंदु पत्रिका का प्रकाशन हिंदी कहानी साहित्य के लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि इसी के माध्यम से श्री जयशंकर प्रसाद कहानी जगत में अवतरित हुए उनकी ग्राम और रसिया बालम 1912 इंदु में ही छपी थी स ।1915 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी कृत् 'उसने कहा था 'कहानी प्रकाश में आई जो अपने सहज पुलकित रसो द्रेक के कारण हिंदी कहानी साहित्य का स्तंभ बन गए ।हिंदी कहानियों में जो लोकप्रियता और अमरत्व 'उसने कहा था 'को प्राप्त है वह हिंदी की किसी कहानी को नहीं। सन1916 में मुंशी प्रेमचंद जी की 'पंच परमेश्वर 'कहानी प्रकाशित हुई । प्रेमचंद का प्रादुर्भाव हिंदी कहानी साहित्य की सबसे अद्भुत घटना थी ।जीवन का कोई पक्ष नहीं था जिसका उन्होंने स्पर्श न किया हो केवल मनोरंजन के लिए काल्पनिक कहानियों की रचना नहीं की बल्कि उनकी कहानियों में जीवन के प्रति दृष्टिकोण, एक सुझाव और समस्या का समाधान विद्यमान है। पूस की रात, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआं कहानियों को दृष्टि में रखते हुए इन्हें युग प्रवर्तक कहानीकार माना जाता है ।
प्रेमचंद युग के दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ श्री जयशंकर प्रसाद हैं। उनकी 69 कहानियां क्रमशः छाया, प्रतिध्वनि,आकाशदीप आंधी,और इंद्रजाल में संकलित है। इनकी अधिकांश कहानियां प्रेम कहानियां है किंतु उसमें रोमांस का जो स्वर है वह स्वस्थ और कलात्मक है उत्तेजक नहीं
प्रेमचंद के बाद कहानी लेखन में अनेक बदलाव आए मुख्यतः दो धाराएं सामने आई पहला प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वाली धारा दूसरा मनोविश्लेषणात्मक कहानी
प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में यशपाल ,अमृतराय ,रंगे राघव, उपेंद्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर ,उग्र, प्रभाकर मच्वे आदि उल्लेखनीय हैं। इन सभी कहानी कारों पर कमोवेश पाश्चात्य दर्शन मार्क्सवाद का प्रभाव है ।
दूसरी कहानी साहित्य धारा के लेखकों में जिनेंद्र, इलाचंद्र जोशी और अन्य प्रमुख हैं। जैनेंद्र में एक और भारतीय दर्शन का आग्रह है तो दूसरी और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से चरित्र चित्रण की प्रेरणा। नए-नए सिल्क में कहानियां लिखने का हिंदी में पहली बार इन्होंने ही प्रारंभ किया। आगे की कहानियों में व्यक्ति का अहम प्रबल रूप में है। इस युग की कहानियां एक और सामाजिक यथार्थ के प्रति सचेत है, तो दूसरी ओर व्यक्ति के मन की गहराइयों का संस्पर्श करने वाली व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक या भाव प्रधान है।

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अनुराधा

हिन्दी के प्रमुख आलोचक एवं उनकी देनa

 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी  यूं तो हिंदी आलोचना का सूत्रपात भारतेंदु युग में ही हो चुका था। किंतु हिंदी आलोचना मुख्यतः आचार्य महावीर प्र...