हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
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हिंदी कहानी का वास्तविक समारंभ कब हुआ यह विषय आज भी विवादास्पद है। वैसे कहानी सुनने सुनाने की परंपरा का वास्तविक प्रारंभ द्विवेदी युग'सरस्वती' पत्रिका(1900) से मान्य है
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ श्रीकांत लाल और डॉक्टर गणपति चंद्र गुप्त ने इंदुमती कहानी को प्रथम मौलिक कहानी स्वीकार किया है।हिं
कहानी के विकास को तीन भागों में बांट सकते हैं
क़) पूर्व प्रेमचंद युग ( सन उन्नीस सौ से 1916 तक)
ख) प्रेमचन्द युग ( सन 1916 से 1936 तक )
ग) उत्तर प्रेमचंद युग(सन 1936 से 1950 तक) 1990 में इंदु पत्रिका का प्रकाशन हिंदी कहानी साहित्य के लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि इसी के माध्यम से श्री जयशंकर प्रसाद कहानी जगत में अवतरित हुए उनकी ग्राम और रसिया बालम 1912 इंदु में ही छपी थी स ।1915 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी कृत् 'उसने कहा था 'कहानी प्रकाश में आई जो अपने सहज पुलकित रसो द्रेक के कारण हिंदी कहानी साहित्य का स्तंभ बन गए ।हिंदी कहानियों में जो लोकप्रियता और अमरत्व 'उसने कहा था 'को प्राप्त है वह हिंदी की किसी कहानी को नहीं। सन1916 में मुंशी प्रेमचंद जी की 'पंच परमेश्वर 'कहानी प्रकाशित हुई । प्रेमचंद का प्रादुर्भाव हिंदी कहानी साहित्य की सबसे अद्भुत घटना थी ।जीवन का कोई पक्ष नहीं था जिसका उन्होंने स्पर्श न किया हो केवल मनोरंजन के लिए काल्पनिक कहानियों की रचना नहीं की बल्कि उनकी कहानियों में जीवन के प्रति दृष्टिकोण, एक सुझाव और समस्या का समाधान विद्यमान है। पूस की रात, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआं कहानियों को दृष्टि में रखते हुए इन्हें युग प्रवर्तक कहानीकार माना जाता है ।
प्रेमचंद युग के दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ श्री जयशंकर प्रसाद हैं। उनकी 69 कहानियां क्रमशः छाया, प्रतिध्वनि,आकाशदीप आंधी,और इंद्रजाल में संकलित है। इनकी अधिकांश कहानियां प्रेम कहानियां है किंतु उसमें रोमांस का जो स्वर है वह स्वस्थ और कलात्मक है उत्तेजक नहीं
प्रेमचंद के बाद कहानी लेखन में अनेक बदलाव आए मुख्यतः दो धाराएं सामने आई पहला प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वाली धारा दूसरा मनोविश्लेषणात्मक कहानी
प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में यशपाल ,अमृतराय ,रंगे राघव, उपेंद्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर ,उग्र, प्रभाकर मच्वे आदि उल्लेखनीय हैं। इन सभी कहानी कारों पर कमोवेश पाश्चात्य दर्शन मार्क्सवाद का प्रभाव है ।
दूसरी कहानी साहित्य धारा के लेखकों में जिनेंद्र, इलाचंद्र जोशी और अन्य प्रमुख हैं। जैनेंद्र में एक और भारतीय दर्शन का आग्रह है तो दूसरी और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से चरित्र चित्रण की प्रेरणा। नए-नए सिल्क में कहानियां लिखने का हिंदी में पहली बार इन्होंने ही प्रारंभ किया। आगे की कहानियों में व्यक्ति का अहम प्रबल रूप में है। इस युग की कहानियां एक और सामाजिक यथार्थ के प्रति सचेत है, तो दूसरी ओर व्यक्ति के मन की गहराइयों का संस्पर्श करने वाली व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक या भाव प्रधान है।
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अनुराधा