शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

हिन्दी के प्रमुख आलोचक एवं उनकी देनa

 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 

यूं तो हिंदी आलोचना का सूत्रपात भारतेंदु युग में ही हो चुका था। किंतु हिंदी आलोचना मुख्यतः आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की आलोचनात्मक कृतियों से ही प्रतिष्ठित हुई। हिंदी में पुस्तक रूप में आलोचना का सूत्रपात महावीर प्रसाद द्ववेदी जी द्वारा हुआ । इनकी आलोचनात्मक कृतियों में भारतीय रस ांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांांां महत्वपूर्ण स्थान मिला ।अंतिम कृतियों में कुछ रोमांटिक भाव धारा है। ये कलाकार को साहित्य के क्षेत्र में ईश्वर का ही अवतार मानते थे ।शास्त्रीय संयम से मुक्त स्वच्छंदतावाद ई परंपरा का रूप इनकी आलोचना में मिलता है। इनका उपन्यास" रहस्य लेख" इनकी आलोचना शैली को स्पष्ट करता है ।द्विवेदी जी ने ही सच्ची आलोचना ग्रंथों का प्रणयन किया । "विक्रमांक ","देव चरित्र चर्चा" नैशधचरित्र, तथा "हिन्दीकालिदासकीआलोचना" इनकी  कुछ प्रमुख प्रसिद्ध आलोचना ग्रंथ है। इनके हिंदी नवरत्न में एक महत्वपूर्ण मानदंड के साथ कवियों का श्रेणी विभाजन हुआ है। यही उसकी मौलिकता है।
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रविवार, 2 मई 2021

सुना तुमने

 

मुझे भी कुछ कहना है
  सुना तुमने.... 
सुनना पड़ेगा 
न चाहो तब भी 
काम तो मुझसे सब चाहिए तुम्हें
   पर मेरा अधिकार कब दोगे 
सुना तुमने... 
पूराा घर तुम्हारा चलो ठीक है। 
मेरा एक कमरा तो होना चाहिए 
सुनाा तुमनेेेेेेे ...
 मैंने कभी कुछ नहीं कहा
  इसका बेजा फायदा उठााया तुमने।
 सुना तुमने..... 
अब बोला तो चरित्र हनन किया तुमने।
   सुना तुमने.. 
कुछ शुरू किया है 
तोो रुकेंगे नहीं।
  चाहे तो दिल से निकाल दो मुझे 
तुम्हारीी फिक्र नहीं 
यहीी बात तुम्हें मार देगी
   क्योंकि मुफ्त सेवा की आदत है तुम्हें।
  सुना तुमने....।

अनु की कलम से...

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सोमवार, 8 मार्च 2021

उदास मन

 मन रह रह के 

उदास हो जाता है ।

 आज क्यों?

 क्या कमी है

 मेरे जीवन में,

 कुछ भी तो नहीं 

फिर चिंता किस बात की।

 दृष्टिपात करती हूं

 पूरे दिनचर्या पर,

 क्या घटित हुआ

 आज सोचती हूं।

 आज क्यों?......

 याद आया 

मां का फोन आया था,

 लड़ाई हुई थी भाई भाभी में

 रात को सभी सो गए 

भूखे पेट,

 बेचारी को पागल बोला

 भाई ने उसे जो

 दो छोटे-छोटे बच्चों की मां

  पूरे दिन उन में लगी रहती है,

 ना कुछ बोलती है 

ना मांगती है

 गूंगी सी बनी रहती है ।

फिर भी पसंद नहीं इन मर्दों को

 न बोलने वाली न

 सुनने वाली,

 औरत आखिर 

बने तो बने कैसे

 सत्ता पर बैठे सत्ताधीशो का

 रोजगार चल रहा है ।

बेरोकटोक 

और युवाओं को कुरौना के नाम

 पर बेरोजगारी के गर्त में

 धकेल कर,

 कैसे सो पाते हैं

 सबका घर उजाड़ कर।

सबका जड़ है बेरोजगारी

निठल्ला पन,

 अपने ही घर में

 एक औरत पर

 अत्याचार होता है।

 और मैं कुछ नहीं कर पाती 

यही सोचकर

 मन उदास हो जाता है

 आज क्यों ?

नहीं बार-बार......

सोमवार, 25 मई 2020

 रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृतियां


  1. विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा 
  2. अद्वैत भावना
  1. सांकेतिक दांपत्य भावi
  1. महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति 
  2. वेदना भाव
  3. सार्वभौम भावना
  4. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
8.प्रतीक विधान
1.विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा----- रहस्यवादी कवि जब उस अनंत शक्ति के साथ अपनी आत्मा का संबंध स्थापित करने के लिए उन्मुख होता है तब ब्रह्मा की सत्ता के प्रति कौतूहल अथवा जिज्ञासा भाव प्रस्फुटित होता है । उसके विराट तत्व से अभिभूत वह उसे जानने की उत्कट अभिलाषा रखता है----- "तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी

 देख लूं उस पार क्या है?
 जा रहे जिस पंथ से युगकल्प
उसका छोर क्या है?"

2.अद्वैत भावना-----आधुनिक रहस्यवादी कविता में वेदांत के अद्वैत वादी दर्शन का माधुर्य पूर्ण वर्णन हुआ है । ब्रह्म जीव एक है तथा इस देह के भीतर ही ब्रह्म का निवास है। इसी देह में इसकी प्राप्ति हो सकती है। यह भाव है रहस्यवाद का---
 "तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय का?
 हारू तो खोऊंअपनापन
पाऊं तो प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूं तेरा ही बंधन"
3. संकेतिक दांपत्य भाव----- आधुनिक रहस्यवादी कवियों ने संकेतिक दांपत्य भाव में बांध कर निराले स्नेह संबंधों  की सृष्टि कर डाली  है----
" प्रिय चिरंतन है सजनी
 छनछन नवीन सुहागिनी में!
4. महामिलन के पश्चात विरहनुभूती----- रहस्यवादी कवियों में मिलन की आकांक्षा ही नहीं मिलन के स्पष्ट संकेत भी मिलते हैं । उस महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति इनके काव्य में प्रचुरताके साथ मिलती है----
"ये सब स्फूलिंग है मेरी
 उस ज्वाला मयी जलन के
 कुछ शेष चिन्ह् है केवल
 मेरे उस महामिलन के"
5. वेदना भाव----- रहस्यवादी कवियों ने दांपत्य संबंध का आधार लेकर रहस्यवाद के आधार रूप वेदना को अत्यंत मार्मिक बना दिया है । उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है---
" ठहरी बेसुध पीड़ा को
 मेरी न कहीं छू लेना
 जब तक वे आ न जगावे
 बस सोती रहने देना"
6. सार्वभौम भावना---- रहस्यवादी कवियों की मूल प्रेरणा धार्मिक ना होकर माननीय एवं संस्कृतिक है। इन्होंने जीवन और जगत के विस्तृत क्षेत्र पर प्रकाश डाला है। महादेवी वर्मा की अधिकांश रचनाएं इसी सार्वभौम भावना की प्रतीक है--- "बिखर बिखर मेरे दीपक जल
 मेरे विश्वासों से द्रुत तर
 सुभग न बुझने का भयकर
 मैं आंचल की ओट किए हूं।"
7. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा----रहस्य वादियों के अनुसार यह असीम प्राकृति उस विराट सत्ता की छाया है। पंत की प्रकृति संबंधी भावनाएं अत्यंत मार्मिक है----
" दूर उन खेतों के उस पार
 जहां तक गई नील झंकार।"
8.प्रतीक विधान---- रहस्यवादी कवियों ने अपने भावा भिव्यंजना के लिए रूपकों या प्रतीकों की शरण ली है। वह अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को संसार की व्यवहारिक भाषा में व्यक्त कर पाए हैं।
"शब्दों के सीमित साधन से
 उर के आकुलआराधना से
 मन के उद्वेलित भावों का
 कैसे रूप बनाऊं?"

 स्पष्ट है कि रहस्यवाद प्रकृति में मानवीय भावों का दार्शनिक निरूपण है। जब हम प्रकृति में जड़ चेतन का एकीकरण दार्शनिक भाव भूमि में करते हैं तो रहस्यवादी भावनाओं की प्रक्रिया आरंभ होती है उसे ही रहस्यवाद कहा जाता है।
                                             अनु की कलम से....

शनिवार, 23 मई 2020

रेखाचित्र किसे कहते हैं?

  • रेखाचित्र गद्य साहित्य की एक विधा है। चित्रकला में जिस प्रकार रेखाओं के माध्यम से दृश्य या रूप को उभार दिया जाता है, उसी प्रकार जब साहित्य में शब्दों के माध्यम से दृश्य या रूप को उभारा जाता है तो उसे रेखाचित्र कहते हैं। इस पूरे उद्धरण में आधुनिक जीवन का एक हड़बड़ा या सा सदृश्य उभारा गया है  । अखबार,नेता,मंत्री, अफ़सर, बैठ के आदि का पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है जिससे आधुनिक जीवन के स्वार्थ एवं पाखंड का पर्दाफाश हो जाता है।

 इस प्रकार रेखा चित्र की प्रधान विशेषता रूप या दृश्य की प्रस्तावना है । सफल रेखाचित्र लिखने के लिए दृश्य की बाहरी और भीतरी विशेषताओं को ताड़ लेने वाली तेज दृष्टि आवश्यक है। रेखा चित्र में दृश्य, रूप या व्यक्ति वास्तविक होते हैं किंतु उनके चित्रण में कल्पना का उपयोग किया जाता है। रेखाचित्र कहानी की भांति  लक्ष्यउन्मुख होता है। रेखाचित्र कहानी से भिन्न इस बात में होते हैं कि उनमें चित्रात्मक ता के माध्यम से ही सब कुछ कहना होता है।
 इस विधा का आरंभ पंडित पद्म शर्मा के' पद्म पराग' से माना जाता है ।सन 1939 में हंस का रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के 15 साहित्यकारों पत्रकारों के रेखाचित्र प्रकाशित हुए। 1946 में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादक त्व में  ' मधुकर' का रेखाचित्र विशेषांक निकला । अश्क की' रेखाएं और चित्र' हरिवंश राय की 'नए पुराने झरोखे'श्रीमती महादेवी वर्मा की 'अतीत के चलचित्र' नामक रेखाचित्र अपने विधान में पूर्ण है । रामवृक्ष बेनीपुरी की 'माटी की मुरतें'  नामक रेखाचित्र की शैली जीवंत और स्फूर्ति दायक है ।
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 अनुराधा

हिन्दी के प्रमुख आलोचक एवं उनकी देनa

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