- विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा
- अद्वैत भावना
- सांकेतिक दांपत्य भावi
- महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति
- वेदना भाव
- सार्वभौम भावना
- प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
1.विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा----- रहस्यवादी कवि जब उस अनंत शक्ति के साथ अपनी आत्मा का संबंध स्थापित करने के लिए उन्मुख होता है तब ब्रह्मा की सत्ता के प्रति कौतूहल अथवा जिज्ञासा भाव प्रस्फुटित होता है । उसके विराट तत्व से अभिभूत वह उसे जानने की उत्कट अभिलाषा रखता है----- "तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी
देख लूं उस पार क्या है?
जा रहे जिस पंथ से युगकल्प
उसका छोर क्या है?"
2.अद्वैत भावना-----आधुनिक रहस्यवादी कविता में वेदांत के अद्वैत वादी दर्शन का माधुर्य पूर्ण वर्णन हुआ है । ब्रह्म जीव एक है तथा इस देह के भीतर ही ब्रह्म का निवास है। इसी देह में इसकी प्राप्ति हो सकती है। यह भाव है रहस्यवाद का---
"तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय का?
हारू तो खोऊंअपनापन
पाऊं तो प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूं तेरा ही बंधन"
3. संकेतिक दांपत्य भाव----- आधुनिक रहस्यवादी कवियों ने संकेतिक दांपत्य भाव में बांध कर निराले स्नेह संबंधों की सृष्टि कर डाली है----
" प्रिय चिरंतन है सजनी
छनछन नवीन सुहागिनी में!
4. महामिलन के पश्चात विरहनुभूती----- रहस्यवादी कवियों में मिलन की आकांक्षा ही नहीं मिलन के स्पष्ट संकेत भी मिलते हैं । उस महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति इनके काव्य में प्रचुरताके साथ मिलती है----
"ये सब स्फूलिंग है मेरी
उस ज्वाला मयी जलन के
कुछ शेष चिन्ह् है केवल
मेरे उस महामिलन के"
5. वेदना भाव----- रहस्यवादी कवियों ने दांपत्य संबंध का आधार लेकर रहस्यवाद के आधार रूप वेदना को अत्यंत मार्मिक बना दिया है । उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है---
" ठहरी बेसुध पीड़ा को
मेरी न कहीं छू लेना
जब तक वे आ न जगावे
बस सोती रहने देना"
6. सार्वभौम भावना---- रहस्यवादी कवियों की मूल प्रेरणा धार्मिक ना होकर माननीय एवं संस्कृतिक है। इन्होंने जीवन और जगत के विस्तृत क्षेत्र पर प्रकाश डाला है। महादेवी वर्मा की अधिकांश रचनाएं इसी सार्वभौम भावना की प्रतीक है--- "बिखर बिखर मेरे दीपक जल
मेरे विश्वासों से द्रुत तर
सुभग न बुझने का भयकर
मैं आंचल की ओट किए हूं।"
7. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा----रहस्य वादियों के अनुसार यह असीम प्राकृति उस विराट सत्ता की छाया है। पंत की प्रकृति संबंधी भावनाएं अत्यंत मार्मिक है----
" दूर उन खेतों के उस पार
जहां तक गई नील झंकार।"
8.प्रतीक विधान---- रहस्यवादी कवियों ने अपने भावा भिव्यंजना के लिए रूपकों या प्रतीकों की शरण ली है। वह अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को संसार की व्यवहारिक भाषा में व्यक्त कर पाए हैं।
"शब्दों के सीमित साधन से
उर के आकुलआराधना से
मन के उद्वेलित भावों का
कैसे रूप बनाऊं?"
स्पष्ट है कि रहस्यवाद प्रकृति में मानवीय भावों का दार्शनिक निरूपण है। जब हम प्रकृति में जड़ चेतन का एकीकरण दार्शनिक भाव भूमि में करते हैं तो रहस्यवादी भावनाओं की प्रक्रिया आरंभ होती है उसे ही रहस्यवाद कहा जाता है।
अनु की कलम से....
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