- रेखाचित्र गद्य साहित्य की एक विधा है। चित्रकला में जिस प्रकार रेखाओं के माध्यम से दृश्य या रूप को उभार दिया जाता है, उसी प्रकार जब साहित्य में शब्दों के माध्यम से दृश्य या रूप को उभारा जाता है तो उसे रेखाचित्र कहते हैं। इस पूरे उद्धरण में आधुनिक जीवन का एक हड़बड़ा या सा सदृश्य उभारा गया है । अखबार,नेता,मंत्री, अफ़सर, बैठ के आदि का पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है जिससे आधुनिक जीवन के स्वार्थ एवं पाखंड का पर्दाफाश हो जाता है।
इस प्रकार रेखा चित्र की प्रधान विशेषता रूप या दृश्य की प्रस्तावना है । सफल रेखाचित्र लिखने के लिए दृश्य की बाहरी और भीतरी विशेषताओं को ताड़ लेने वाली तेज दृष्टि आवश्यक है। रेखा चित्र में दृश्य, रूप या व्यक्ति वास्तविक होते हैं किंतु उनके चित्रण में कल्पना का उपयोग किया जाता है। रेखाचित्र कहानी की भांति लक्ष्यउन्मुख होता है। रेखाचित्र कहानी से भिन्न इस बात में होते हैं कि उनमें चित्रात्मक ता के माध्यम से ही सब कुछ कहना होता है।
इस विधा का आरंभ पंडित पद्म शर्मा के' पद्म पराग' से माना जाता है ।सन 1939 में हंस का रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के 15 साहित्यकारों पत्रकारों के रेखाचित्र प्रकाशित हुए। 1946 में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादक त्व में ' मधुकर' का रेखाचित्र विशेषांक निकला । अश्क की' रेखाएं और चित्र' हरिवंश राय की 'नए पुराने झरोखे'श्रीमती महादेवी वर्मा की 'अतीत के चलचित्र' नामक रेखाचित्र अपने विधान में पूर्ण है । रामवृक्ष बेनीपुरी की 'माटी की मुरतें' नामक रेखाचित्र की शैली जीवंत और स्फूर्ति दायक है ।
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अनुराधा