जीवनी साहित्य गद्य परंपरा की उत्कृष्ट विधा है। हिंदी में आधुनिक काल में बड़ी संख्या में जीवनिया लिखी गई हैं। कुछ विद्वान जीवनी और आत्मकथा को एक ही विधा के अंतर्गत स्वीकारते हैं किंतु दोनों भिन्न हैं। जीवनी अन्य के द्वारा तथा आत्मकथा स्वयं के द्वारा लिखी जाती है।
भारतेंदु युग से ही जीवनी साहित्य का उद्भव माना जाता है। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ जीवनिया मिलती हैं। कुछ विद्वानों ने कार्तिक प्रसाद खत्री द्वारा लिखित "मीराबाई"(1899) को हिंदी की प्रथम साहित्यिक जीवनी माना है । भारतेंदु युग में देवी प्रसाद मुंसिफ का नाम जीवनी लेखकों में विशेष लिया जाता है।जो जीवनी लिखी गई उसमें प्रमुख समाज सुधारक श्री भद्दयानंद सरस्वती पर लिखी गई जीवनिया ही प्रमुख है। भारतेंदु युग से जीवनी विधा का आरंभ और दिवेदी युग इसका सही अर्थों में परिष्कार स्वीकारना उचित होगा।
डॉ पदम सिंह शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद तथा निराला पर लिखित जीवनी को उत्कृष्ट जीवनी माना है। प्रेमचंद की जीवनी "कलम का सिपाही" नाम से उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है । दूसरी जीवनी के लेखक हैं रामविलास शर्मा नाम है "निराला की साहित्य साधना "इसीप्रकार विष्णु प्रभाकर कृत "आवारा मसीहा" शीर्षक से शरद चंद की जीवनी और भगवती प्रसाद कृत मनीषी की लोक यात्रा" में गोपीनाथ कविराज की जीवनी भी प्रकाशित हुई है, जिन्हें जीवनी साहित्य जगत के उज्जवल कीर्ति स्तंभ मान सकते हैं जो युग युग तक उदीप्त होकर जीवनी लेखकों के पथ को आलोकित करते रहेंगे।
निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में जीवनी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। जीवनी लेखन में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। यह नवीन साहित्य गद्य विधाएं पृथक होते हुए भी अनेक बार एक दसरे की पूरक प्रतीत होती है।
भारतेंदु युग से ही जीवनी साहित्य का उद्भव माना जाता है। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ जीवनिया मिलती हैं। कुछ विद्वानों ने कार्तिक प्रसाद खत्री द्वारा लिखित "मीराबाई"(1899) को हिंदी की प्रथम साहित्यिक जीवनी माना है । भारतेंदु युग में देवी प्रसाद मुंसिफ का नाम जीवनी लेखकों में विशेष लिया जाता है।जो जीवनी लिखी गई उसमें प्रमुख समाज सुधारक श्री भद्दयानंद सरस्वती पर लिखी गई जीवनिया ही प्रमुख है। भारतेंदु युग से जीवनी विधा का आरंभ और दिवेदी युग इसका सही अर्थों में परिष्कार स्वीकारना उचित होगा।
डॉ पदम सिंह शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद तथा निराला पर लिखित जीवनी को उत्कृष्ट जीवनी माना है। प्रेमचंद की जीवनी "कलम का सिपाही" नाम से उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है । दूसरी जीवनी के लेखक हैं रामविलास शर्मा नाम है "निराला की साहित्य साधना "इसीप्रकार विष्णु प्रभाकर कृत "आवारा मसीहा" शीर्षक से शरद चंद की जीवनी और भगवती प्रसाद कृत मनीषी की लोक यात्रा" में गोपीनाथ कविराज की जीवनी भी प्रकाशित हुई है, जिन्हें जीवनी साहित्य जगत के उज्जवल कीर्ति स्तंभ मान सकते हैं जो युग युग तक उदीप्त होकर जीवनी लेखकों के पथ को आलोकित करते रहेंगे।
निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में जीवनी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। जीवनी लेखन में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। यह नवीन साहित्य गद्य विधाएं पृथक होते हुए भी अनेक बार एक दसरे की पूरक प्रतीत होती है।
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