btkhi.blogspot.comआंचलिक उपन्यास में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।
नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
धन्यवाद
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।
नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
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