सोमवार, 8 मार्च 2021

उदास मन

 मन रह रह के 

उदास हो जाता है ।

 आज क्यों?

 क्या कमी है

 मेरे जीवन में,

 कुछ भी तो नहीं 

फिर चिंता किस बात की।

 दृष्टिपात करती हूं

 पूरे दिनचर्या पर,

 क्या घटित हुआ

 आज सोचती हूं।

 आज क्यों?......

 याद आया 

मां का फोन आया था,

 लड़ाई हुई थी भाई भाभी में

 रात को सभी सो गए 

भूखे पेट,

 बेचारी को पागल बोला

 भाई ने उसे जो

 दो छोटे-छोटे बच्चों की मां

  पूरे दिन उन में लगी रहती है,

 ना कुछ बोलती है 

ना मांगती है

 गूंगी सी बनी रहती है ।

फिर भी पसंद नहीं इन मर्दों को

 न बोलने वाली न

 सुनने वाली,

 औरत आखिर 

बने तो बने कैसे

 सत्ता पर बैठे सत्ताधीशो का

 रोजगार चल रहा है ।

बेरोकटोक 

और युवाओं को कुरौना के नाम

 पर बेरोजगारी के गर्त में

 धकेल कर,

 कैसे सो पाते हैं

 सबका घर उजाड़ कर।

सबका जड़ है बेरोजगारी

निठल्ला पन,

 अपने ही घर में

 एक औरत पर

 अत्याचार होता है।

 और मैं कुछ नहीं कर पाती 

यही सोचकर

 मन उदास हो जाता है

 आज क्यों ?

नहीं बार-बार......

सोमवार, 25 मई 2020

 रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृतियां


  1. विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा 
  2. अद्वैत भावना
  1. सांकेतिक दांपत्य भावi
  1. महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति 
  2. वेदना भाव
  3. सार्वभौम भावना
  4. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
8.प्रतीक विधान
1.विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा----- रहस्यवादी कवि जब उस अनंत शक्ति के साथ अपनी आत्मा का संबंध स्थापित करने के लिए उन्मुख होता है तब ब्रह्मा की सत्ता के प्रति कौतूहल अथवा जिज्ञासा भाव प्रस्फुटित होता है । उसके विराट तत्व से अभिभूत वह उसे जानने की उत्कट अभिलाषा रखता है----- "तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी

 देख लूं उस पार क्या है?
 जा रहे जिस पंथ से युगकल्प
उसका छोर क्या है?"

2.अद्वैत भावना-----आधुनिक रहस्यवादी कविता में वेदांत के अद्वैत वादी दर्शन का माधुर्य पूर्ण वर्णन हुआ है । ब्रह्म जीव एक है तथा इस देह के भीतर ही ब्रह्म का निवास है। इसी देह में इसकी प्राप्ति हो सकती है। यह भाव है रहस्यवाद का---
 "तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय का?
 हारू तो खोऊंअपनापन
पाऊं तो प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूं तेरा ही बंधन"
3. संकेतिक दांपत्य भाव----- आधुनिक रहस्यवादी कवियों ने संकेतिक दांपत्य भाव में बांध कर निराले स्नेह संबंधों  की सृष्टि कर डाली  है----
" प्रिय चिरंतन है सजनी
 छनछन नवीन सुहागिनी में!
4. महामिलन के पश्चात विरहनुभूती----- रहस्यवादी कवियों में मिलन की आकांक्षा ही नहीं मिलन के स्पष्ट संकेत भी मिलते हैं । उस महामिलन के पश्चात बिरहा अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति इनके काव्य में प्रचुरताके साथ मिलती है----
"ये सब स्फूलिंग है मेरी
 उस ज्वाला मयी जलन के
 कुछ शेष चिन्ह् है केवल
 मेरे उस महामिलन के"
5. वेदना भाव----- रहस्यवादी कवियों ने दांपत्य संबंध का आधार लेकर रहस्यवाद के आधार रूप वेदना को अत्यंत मार्मिक बना दिया है । उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है---
" ठहरी बेसुध पीड़ा को
 मेरी न कहीं छू लेना
 जब तक वे आ न जगावे
 बस सोती रहने देना"
6. सार्वभौम भावना---- रहस्यवादी कवियों की मूल प्रेरणा धार्मिक ना होकर माननीय एवं संस्कृतिक है। इन्होंने जीवन और जगत के विस्तृत क्षेत्र पर प्रकाश डाला है। महादेवी वर्मा की अधिकांश रचनाएं इसी सार्वभौम भावना की प्रतीक है--- "बिखर बिखर मेरे दीपक जल
 मेरे विश्वासों से द्रुत तर
 सुभग न बुझने का भयकर
 मैं आंचल की ओट किए हूं।"
7. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा----रहस्य वादियों के अनुसार यह असीम प्राकृति उस विराट सत्ता की छाया है। पंत की प्रकृति संबंधी भावनाएं अत्यंत मार्मिक है----
" दूर उन खेतों के उस पार
 जहां तक गई नील झंकार।"
8.प्रतीक विधान---- रहस्यवादी कवियों ने अपने भावा भिव्यंजना के लिए रूपकों या प्रतीकों की शरण ली है। वह अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को संसार की व्यवहारिक भाषा में व्यक्त कर पाए हैं।
"शब्दों के सीमित साधन से
 उर के आकुलआराधना से
 मन के उद्वेलित भावों का
 कैसे रूप बनाऊं?"

 स्पष्ट है कि रहस्यवाद प्रकृति में मानवीय भावों का दार्शनिक निरूपण है। जब हम प्रकृति में जड़ चेतन का एकीकरण दार्शनिक भाव भूमि में करते हैं तो रहस्यवादी भावनाओं की प्रक्रिया आरंभ होती है उसे ही रहस्यवाद कहा जाता है।
                                             अनु की कलम से....

शनिवार, 23 मई 2020

रेखाचित्र किसे कहते हैं?

  • रेखाचित्र गद्य साहित्य की एक विधा है। चित्रकला में जिस प्रकार रेखाओं के माध्यम से दृश्य या रूप को उभार दिया जाता है, उसी प्रकार जब साहित्य में शब्दों के माध्यम से दृश्य या रूप को उभारा जाता है तो उसे रेखाचित्र कहते हैं। इस पूरे उद्धरण में आधुनिक जीवन का एक हड़बड़ा या सा सदृश्य उभारा गया है  । अखबार,नेता,मंत्री, अफ़सर, बैठ के आदि का पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है जिससे आधुनिक जीवन के स्वार्थ एवं पाखंड का पर्दाफाश हो जाता है।

 इस प्रकार रेखा चित्र की प्रधान विशेषता रूप या दृश्य की प्रस्तावना है । सफल रेखाचित्र लिखने के लिए दृश्य की बाहरी और भीतरी विशेषताओं को ताड़ लेने वाली तेज दृष्टि आवश्यक है। रेखा चित्र में दृश्य, रूप या व्यक्ति वास्तविक होते हैं किंतु उनके चित्रण में कल्पना का उपयोग किया जाता है। रेखाचित्र कहानी की भांति  लक्ष्यउन्मुख होता है। रेखाचित्र कहानी से भिन्न इस बात में होते हैं कि उनमें चित्रात्मक ता के माध्यम से ही सब कुछ कहना होता है।
 इस विधा का आरंभ पंडित पद्म शर्मा के' पद्म पराग' से माना जाता है ।सन 1939 में हंस का रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के 15 साहित्यकारों पत्रकारों के रेखाचित्र प्रकाशित हुए। 1946 में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादक त्व में  ' मधुकर' का रेखाचित्र विशेषांक निकला । अश्क की' रेखाएं और चित्र' हरिवंश राय की 'नए पुराने झरोखे'श्रीमती महादेवी वर्मा की 'अतीत के चलचित्र' नामक रेखाचित्र अपने विधान में पूर्ण है । रामवृक्ष बेनीपुरी की 'माटी की मुरतें'  नामक रेखाचित्र की शैली जीवंत और स्फूर्ति दायक है ।
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 अनुराधा

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

आंचलिक उपन्यासों में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान

btkhi.blogspot.comआंचलिक उपन्यास में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
  
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक  हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।

 नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
धन्यवाद
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रविवार, 5 अप्रैल 2020

छायावाद का परिचय तथा उसकी प्रमुख प्रवृतियां

             
                     छायावाद का परिचय
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      छायावाद ने आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया और आधुनिक पौराणिक धार्मिक चेतना के विरोध आधुनिक अलौकिक चेतना की शंख ध्वनि की। छायावाद का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है तथा इसके स्वरूप विश्लेषण के लिए यह कहा जा सकता है कि छायावाद द्विवेदी युग की जड़ श्रृंखलाओं को तोड़ व्यक्ति तथा कला की स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली एक ऐसी मानव वेदी काल धारा है जिसने युग की स्थुलताओ के बीच चलने वाली सूक्ष्मा मर्मज्ञ छाया को व्यक्ति के माध्यम से ग्रहण कर धवनात्मकता, लक्षनिकिता तथा सौंदर्य मय प्रतीक विधान के सहारे मूर्तिमान करना अपना ध्येय बनाया। पहली बार कवि के संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रकाशन हुआ । इसमें आत्मानुभूति का आधार भी व्यक्ति था। इस काल के प्रमुख कवि रहे प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा । गौण कवियों में डॉ रामकुमार वर्मा, मुकुटधर पांडे, मैथिलीशरण गुप्त, भगवती चरण वर्मा, हरि कृष्ण प्रेमी, जानकी बल्लभ शास्त्री आदि आते हैं।

 छायावाद को अंग्रेजी रोमांटिसिजम की नकल मारने की भी एक सुदिर्घ की परंपरा चलती आ रही है। जिसका संक्षिप्त स्पष्टीकरण भी अत्यंत आवश्यक है।
१) रोमांटी सिजम में एक स्वतंत्र जाति का साहित्य है। अतः उसमें रोमानी स्फुरन कुछ अधिक है। छायावाद पराधीन युग का साहित्य है। अतः उसमें कुंठा भी हैं साथ ही विद्रोह का स्वर भी दोनों में है। लेकिन छायावादी कवि के स्वर में जो आग्रह है, विद्रोह की भावना है उसके पीछे राष्ट्रवादी स्वतंत्र कामना का प्रबल आग्रह भी है जबकि आंग्ल रोमानी काव्य  के विद्रोह का आधार और प्रेरणा स्रोत प्राय: मानवतावाद है ।

२)रोमांटिसिजम के प्रादुर्भाव का मुख्य कारण राजनीतिक आर्थिक था जबकि छायावाद का संस्कृतिक

३ )रोमांटिकसेज में  विषय पर अधिक ध्यान दिया गया है जबकि छायावाद में विधान पर
 छायावाद की कुछ प्रमुख प्रवृतियां अग्र लिखित है----

१)वैयक्तिक ता---- द्विवेदी युगीन कविता विषय प्रधान थी जबकि छायावादी कविताएं  विषयी प्रधान। द्विवेदी युग की  इतिवृत्तात्मकता और वस्तुपरकता की प्रतिक्रियाओं में छायावाद की कविता में भावात्मक और आत्म गत हुई। द्विवेदी युगीन कविता का विषय बाहर का सामाजिक जीवन था और कवि भी बहिर्मुखी होकर कविता रचता था। इसके विपरीत छायावाद की कविता का विषय अंतरंग व्यक्तिगत जीवन हुआ और इसका कवि आत्म लीन होकर लिखने लगा। छायावाद की यही वैयक्तिकता प्रसाद में आनंदवाद, निराला में अद्वैतवाद, पंत में आत्मरति और महादेवी में परोक्ष रति के रूप में प्रकट हुई। एक पंक्ति उदाहरणीय  है----

                   वन गुहा कुंज मरू अंचल में ।
                   हूं खोज रहा अपना विकास।।

२) सौंदर्यानुभूति----यदपि सौंदर्य भावना की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति पूर्ववर्ती काव्य में भी उपलब्ध हुई है पर छायावाद में इसका स्वरूप पूर्ववर्ती रूप से भिन्न है।यहां सौंदर्य से अभिप्राय बाह्य सौंदर्य से नहीं बल्कि सूक्ष्म आत्मिक सौंदर्य से है। छायावादी कवि अति इंद्रियों सौंदर्य का पुजारी होता है। वह प्रकृति के कण-कण में अलौकिक सौंदर्य की झलक देखता है। बाह्य सौंदर्य की अपेक्षा आंतरिक सौंदर्य के उद्घाटन में उसकी दृष्टि अधिक रमती है। छायावादी कविता में सौंदर्य अपनी पूर्णता के साथ हुआ है। सौंदर्य के पुजारी छायावादी कवियों ने नारी को नाना रूपों में व्यक्त किया है। उदाहरणार्थ
             " शशि मुख पर घूंघट डाले
              अंचल में दीप छिपाएं
               गोधूलि के धूमिल पट में
               कौतूहल से तुम आए।"

३) प्रेम भावना की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति---- छायावादी काव्य में प्रणय भावना का विकास विभिन्न रूपों में हुआ है । जिनमें प्रकृति प्रेम, नारी प्रेम, अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम आदि महत्वपूर्ण है। प्रकृति प्रेम का जीवित उदाहरण हमें पंत की कविताओं में मिलता है। प्रकृति के सुकुमार कवि पंत को प्रकृति की सुंदरता अधिक रमणीय प्रतीत होती है
           " छोड़ द्रूमो की मृदु छाया
           तोड़ प्रकृति से भी माया
           बाले तेरे बाल जाल में
            कैसे उलझा दूं लोचन
            भूल अभी से इस जग को।"
 नारी प्रेम की भी सुंदर अभिव्यंजना छायावादी रचनाओं में मिलती है।  छायावादी कवियों ने नारी के स्थूल सौंदर्य की अपेक्षा सूक्ष्म सौंदर्य पर ही दृष्टि केंद्रित रखी है। यहां स्वकिया और परकिया, राधा और गोपी का झगड़ा नहीं है, नारी को उन्होंने देवी, मां, प्राण के रूप में देखा है फिर भी कम्य रूप और प्रेयसी रूप ही अधिक  रहा है फिर भी प्रसाद, निराला, महादेवी सबने संग में पावन गंगा स्नान की पवित्रता बनाए रखी है। कवि प्रसाद ने एक स्थान पर लिखा है
       " नारी तुम केवल श्रद्धा हो
        विश्वास रजत नग पग तल में
         पीयूष स्रोत सी बहा करो
         जीवन के सुंदर समतल में।"
छायावाद में अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम भी दिखाई पड़ता है। इस अज्ञात सत्ता को कवी कभी कभी प्रेयसी तो कभी प्रियतम के रूप में तो कभी चेतन प्रकृति के रूप में देखता है। छायावादी कवि सृष्टि के कण-कण में इसी अज्ञात सत्ता की झलक पाता है। महादेवी जी ने अज्ञात प्रियतम के प्रति अपना प्रणय निवेदन इस प्रकार किया है----
           " मैं  कन- कन में ढाल रही हूं,
             आंसू के मिस प्यार किसी का।
             मैं पलकों में पाल रही हूं,
             यह सपना सुकुमार किसी का"

इतना ही नहीं महादेवी जी का प्रियतम तो इतना निकट हो गया है कि परिचय पूछना भी व्यर्थ है----" तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या।"

४) वेदना और करुणा की अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति---- छायावाद में वेदना और करीना करुणा की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति भी दृष्टिगत होती है । जन्म- मरण, विरह- मिलन, हास्य- रुदन से उत्पन्न विषमताओं से घिरे हुए मानव जीवन को देखते हुए कवि हृदय में वेदना और करुणा का पारावार उमड़ पड़ता है । मानव- हृदय की आकांक्षाओं, अभिलाषा ओं की विफलता पर वह करुण क्रंदन करने लगता है । ज्ञातव्य है कि छायावादी कवि सौंदर्य प्रेमी होता है किंतु सौंदर्य  की क्षणभंगुर ता को देखकर उसका ह्रदय  हहाकार कर उठता है।
प्रसाद जी लिखते हैं----
         " सुनकर तुम क्या भला करोगे,
            मेरी भोली आत्मकथा।
            अभी समय भी नहीं थकी,
            सोई है मेरी मौन व्यथा।।
 कविवर पंत ने भी वेदना को काव्य का प्रमुख तत्व मानते हुए लिखा है----
          "  वियोगी होगा पहला कवि
              आह से निकला होगा गान।
              उमड़ कर  आंखों में चुपचाप
              बही होगी कविता अनजान।।"

 कवियित्री महादेवी ने तो पीड़ा को अपने जीवन का अंग ही बना लिया है। पीड़ा  उन्हें इतना प्रिय है कि वह अपने प्रिय को भी पीड़ा में ढूंढती है----
       
          " तुमको पीड़ा में ढूंढा तुममें ढूढूंगी पीड़ा"

५ )प्रकृतिका मानवीकरण---- छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति प्रकृति का मानवीकरण है । छायावादी काव्य में प्रकृति चित्रण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।प्रकृति छायावाद के प्राणों में पाई जाती है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को अनेक रूपों में अपनाया है और उसमें वे समस्त भावनाएं प्रदर्शित की जाती हैं जो नर- नारी के जीवन में किसी भी प्रकार उत्पन्न हो सकती है । महाकवि निराला ने संध्या का सुंदरी के रूप में अत्यंत सुंदर सचिव सजीव चित्र खींचा है----
        "देहावसान का समय
         मेघमय आसमान से उतर रही है
           वह संध्या सुंदरी
           परी सी धीरे! धीरे! धीरे!"
 निराला की जूही की कली कविता में तो मलयानील और कलिन में  प्रेम और छेड़छाड़ भी दिखाई गई है----
             "विजन वल वलरी पर सोती थी सुहाग भरी
    स्नेह स्वप्न मग्न अमल कोमल
    तरुण तरुणी जूही की कली
    दृग बंद किए शिथिल पत्रांक में"

 कविवर प्रसाद ने भी प्रकृति को मानवीय रूप प्रदान किया है। "बीती विभावरी जाग री
 अंबर पनघट में डुबो रही
 तारा घट उषा नागरी।"

६) रहस्यात्मकता---- छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति रहस्यातमक  भावना की अभिव्यंजना है। कुछ आलोचकों ने रहस्यवाद को छायावाद का प्राण कहा है। विश्व के अथाह प्रकृति के सभी उपादानों में चेतना का आरोप छायावाद की पहली सीढ़ी है। तो किसी असीम के प्रति अनुराग जनित आत्मा विसर्जन का भाव रहस्यवादी छायावाद की दूसरी सीढ़ी। ऐसा स्वयं छायावादी कवित्री महादेवी ने कहा है। छायावाद में रहस्य की प्रधानता का कारण भौतिकता के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। दिवेदी युग का विषय पार्थिव संसार था। अतः छायावादी कवियों ने उसके विरोध में आलोक को अपनाया। प्राचीन और नवीन रहस्यवाद में भी अंतर है। प्राचीन रहस्यवाद कवि धार्मिक भावना से आकृष्ट हुए और आधुनिकता रहस्यवादी कवि भावुकता  और कल्पना की अधिकता के कारण स्मरणीय है।  आधुनिक युग तर्क प्रधान है। कविवर पंत की 'मौन निमंत्रण' शीर्षक कविता में जिज्ञासा की अतिशय व्यंजना हुई है----
      " तू मौन में जब एकाकार
         ऊंघता जब एक साथ संसार
         भीरू झींगुर कुल की झंकार
          कंपा देती तंद्रा के तान।"

महादेवी जी अज्ञेय को जीवन की उत्कृष्ट और उत्कट अभिलाषा बतलाती हैं----
       " तोड़ दो यह छितिज मैं भी देख लूं उस पार क्या है"

७ )राष्ट्रीय भावना की प्रवृत्ति---- छायावादी रचनाओं पर कतिपय आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि जिस समय स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था उस समय यह ' मैं' के गीत गा रहे थे, परंतु प्रसाद के गीतों जैसे----
      " हिमाद्रि तुंग श्रृंग से
         प्रबुद्ध शुद्ध भारती"
        " अरुण यह मधुमय देश हमारा" या फिर निराला की "जागो फिर एक बार" कविता आदि को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीयतवादी भावना इन कवियों में भी प्रछन्न है। निराला जी आर्थिक दुर्दशा का कारण अंग्रेजों के शोषण नीति को बतलाते हुए साफ लिखते हैं----
        " बानिज के राज ने लक्ष्मी को हर लिया।
        टापू में ले चल कर रखा और कैद किया।।"

८)बौद्धिकता---- छायावादी रचनाओं की एक प्रमुख प्रवृत्ति बौद्धिकता है । निराला काव्य की सम्यक अनुशीलन से पता चलता है कि उनमें भावुकता से अधिक एक दार्शनिक का गूढ़ चिंतन है। जागो फिर एक बार में उनकी बौद्धिकता द्रस्त्व्य है----
     " जागो फिर एक बार
        पशु नहीं वीर तुम
          समर सुर युद्ध नहीं
          समर सुर क्रूर नहीं"

 सचमुच आश्चर्य की बात है कि इतनी सारी उदात्त प्रवृत्तियों के रहते हुए भी छायावाद 20 ही वर्षों में चरमरा क्यों गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि छायावादी आदर्श उपयोगी नहीं थे।वस्तुत: आज के इस भौतिकता वादी युग में परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि कदम से कदम मिलाकर नहीं चलने पर गिरना अवश्यंभावी है। यही बात छायावाद के साथ भी है। फिर भी अभी छायावादीता पूरी तरह से मिटी नहीं है। नई कविता का दौर भले ही आ गया हो पर एक कोने से छायावाद की आवाज कभी कभी सुनाई पड़ी जाती है। भले ही यह छायावाद आज इतिहास की वस्तु बन गया हो पर उसके संबंध में इतना ही कहा जाएगा कि वह हिंदी काव्यधारा का ही स्वभाविक विकास था। जिसकी परिणति नई कविता है। इसने सौंदर्य और अटूट प्रेम का जो मंत्र फूंका वह विश्वव्यापी और सास्वत तत्व है। विश्व बंधुत्व और नव मानवता  की भावना इसकी अक्षय निधि है। गांधी ने भी इसी के लिए गोलियां खाई थी। वह मर तो गया पर क्या मरकर भी अमर नहीं हो गया। छायावाद का स्वर भी अभी तक गूंज गूंज रहा है----
       " हार बैठे जीवन का दाव
        जीतते किसको मर कर  वीर।"
               समाप्त
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अनुराधा

हिन्दी के प्रमुख आलोचक एवं उनकी देनa

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