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गुरुवार, 30 अप्रैल 2020
शनिवार, 25 अप्रैल 2020
आंचलिक उपन्यासों में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान
btkhi.blogspot.comआंचलिक उपन्यास में फणीश्वर नाथ रेणु का योगदान
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।
नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
धन्यवाद
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ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यासों को आंचलिक कह कर उन्हें सीमित कर दिया है । रेणु के मैला आंचल के प्रकाशन से पूर्व नागार्जुन का बलचनमा प्रकाशित हो चुका था, पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का रंग कम नहीं है। प्रेमचंद के उपन्यासों में भी गांव के निवासियों की कथाएं हैं। पर उन्हें आंचलिक क्यों नहीं कहा जाता है? जिन उपन्यासों को ग्रामंचल का उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत, खलिहान, नदी- नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल - बैल, भाषा- गीत, त्योहार आदि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत स्वर पाते हैं। तात्पर्य है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है। रेनू ने अपने उपन्यासों में ग्रामांचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर केवल उन्हीं की कृतियों को आंचलिक कहा जाना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ही सही अर्थों में आंचलिक है।' मैला आंचल' और 'परती परीकथा' में ग्रामीणों के जितने विशद और सवा क चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्य तथाकथित आंचलिक उपन्यासों में नहीं। इन दोनों उपन्यासों में छोटी-छोटी घटनाओं, कथाओं, अवधारणाओं, पारस्परिक संबंधों आदि के विशिष्ट चित्र मिलते हैं। जो पूरे अंचल के संबंध में संश्लिष्ट और गत्यात्मक हो गए हैं। आधुनिकता वादी उपकरणों के सन्नी वेश से गांव का वातावरण अपने आप बदलने लगता है। इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों के नकाब उतार कर युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेनू की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है। रेनू के उपन्यासों में एक विशिष्ट संपूर्णता दिखाई देती है। जो आगे लिखे जाने वाले ग्राम आंचलिक उपन्यासों के विकास में बाधक सिद्ध हुई।
नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा जिले का राजनीतिक- सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है । जहां तक विषय वस्तु के चुनाव का संबंध है गांव की थीम पर आरोपित प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार चलते हैं। फलस्वरूप उपन्यासों की सृजनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो गई है।' रतिनाथ की चाची',' नई पौध',' बाबा बटेश्वर नाथ',' दुख मोचन',' वरुण के बेटे' आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
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रविवार, 5 अप्रैल 2020
छायावाद का परिचय तथा उसकी प्रमुख प्रवृतियां
छायावाद का परिचय
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छायावाद ने आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया और आधुनिक पौराणिक धार्मिक चेतना के विरोध आधुनिक अलौकिक चेतना की शंख ध्वनि की। छायावाद का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है तथा इसके स्वरूप विश्लेषण के लिए यह कहा जा सकता है कि छायावाद द्विवेदी युग की जड़ श्रृंखलाओं को तोड़ व्यक्ति तथा कला की स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली एक ऐसी मानव वेदी काल धारा है जिसने युग की स्थुलताओ के बीच चलने वाली सूक्ष्मा मर्मज्ञ छाया को व्यक्ति के माध्यम से ग्रहण कर धवनात्मकता, लक्षनिकिता तथा सौंदर्य मय प्रतीक विधान के सहारे मूर्तिमान करना अपना ध्येय बनाया। पहली बार कवि के संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रकाशन हुआ । इसमें आत्मानुभूति का आधार भी व्यक्ति था। इस काल के प्रमुख कवि रहे प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा । गौण कवियों में डॉ रामकुमार वर्मा, मुकुटधर पांडे, मैथिलीशरण गुप्त, भगवती चरण वर्मा, हरि कृष्ण प्रेमी, जानकी बल्लभ शास्त्री आदि आते हैं।
छायावाद को अंग्रेजी रोमांटिसिजम की नकल मारने की भी एक सुदिर्घ की परंपरा चलती आ रही है। जिसका संक्षिप्त स्पष्टीकरण भी अत्यंत आवश्यक है।
१) रोमांटी सिजम में एक स्वतंत्र जाति का साहित्य है। अतः उसमें रोमानी स्फुरन कुछ अधिक है। छायावाद पराधीन युग का साहित्य है। अतः उसमें कुंठा भी हैं साथ ही विद्रोह का स्वर भी दोनों में है। लेकिन छायावादी कवि के स्वर में जो आग्रह है, विद्रोह की भावना है उसके पीछे राष्ट्रवादी स्वतंत्र कामना का प्रबल आग्रह भी है जबकि आंग्ल रोमानी काव्य के विद्रोह का आधार और प्रेरणा स्रोत प्राय: मानवतावाद है ।
२)रोमांटिसिजम के प्रादुर्भाव का मुख्य कारण राजनीतिक आर्थिक था जबकि छायावाद का संस्कृतिक
३ )रोमांटिकसेज में विषय पर अधिक ध्यान दिया गया है जबकि छायावाद में विधान पर
छायावाद की कुछ प्रमुख प्रवृतियां अग्र लिखित है----
१)वैयक्तिक ता---- द्विवेदी युगीन कविता विषय प्रधान थी जबकि छायावादी कविताएं विषयी प्रधान। द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता और वस्तुपरकता की प्रतिक्रियाओं में छायावाद की कविता में भावात्मक और आत्म गत हुई। द्विवेदी युगीन कविता का विषय बाहर का सामाजिक जीवन था और कवि भी बहिर्मुखी होकर कविता रचता था। इसके विपरीत छायावाद की कविता का विषय अंतरंग व्यक्तिगत जीवन हुआ और इसका कवि आत्म लीन होकर लिखने लगा। छायावाद की यही वैयक्तिकता प्रसाद में आनंदवाद, निराला में अद्वैतवाद, पंत में आत्मरति और महादेवी में परोक्ष रति के रूप में प्रकट हुई। एक पंक्ति उदाहरणीय है----
वन गुहा कुंज मरू अंचल में ।
हूं खोज रहा अपना विकास।।
२) सौंदर्यानुभूति----यदपि सौंदर्य भावना की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति पूर्ववर्ती काव्य में भी उपलब्ध हुई है पर छायावाद में इसका स्वरूप पूर्ववर्ती रूप से भिन्न है।यहां सौंदर्य से अभिप्राय बाह्य सौंदर्य से नहीं बल्कि सूक्ष्म आत्मिक सौंदर्य से है। छायावादी कवि अति इंद्रियों सौंदर्य का पुजारी होता है। वह प्रकृति के कण-कण में अलौकिक सौंदर्य की झलक देखता है। बाह्य सौंदर्य की अपेक्षा आंतरिक सौंदर्य के उद्घाटन में उसकी दृष्टि अधिक रमती है। छायावादी कविता में सौंदर्य अपनी पूर्णता के साथ हुआ है। सौंदर्य के पुजारी छायावादी कवियों ने नारी को नाना रूपों में व्यक्त किया है। उदाहरणार्थ
" शशि मुख पर घूंघट डाले
अंचल में दीप छिपाएं
गोधूलि के धूमिल पट में
कौतूहल से तुम आए।"
३) प्रेम भावना की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति---- छायावादी काव्य में प्रणय भावना का विकास विभिन्न रूपों में हुआ है । जिनमें प्रकृति प्रेम, नारी प्रेम, अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम आदि महत्वपूर्ण है। प्रकृति प्रेम का जीवित उदाहरण हमें पंत की कविताओं में मिलता है। प्रकृति के सुकुमार कवि पंत को प्रकृति की सुंदरता अधिक रमणीय प्रतीत होती है
" छोड़ द्रूमो की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूं लोचन
भूल अभी से इस जग को।"
नारी प्रेम की भी सुंदर अभिव्यंजना छायावादी रचनाओं में मिलती है। छायावादी कवियों ने नारी के स्थूल सौंदर्य की अपेक्षा सूक्ष्म सौंदर्य पर ही दृष्टि केंद्रित रखी है। यहां स्वकिया और परकिया, राधा और गोपी का झगड़ा नहीं है, नारी को उन्होंने देवी, मां, प्राण के रूप में देखा है फिर भी कम्य रूप और प्रेयसी रूप ही अधिक रहा है फिर भी प्रसाद, निराला, महादेवी सबने संग में पावन गंगा स्नान की पवित्रता बनाए रखी है। कवि प्रसाद ने एक स्थान पर लिखा है
" नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में।"
छायावाद में अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम भी दिखाई पड़ता है। इस अज्ञात सत्ता को कवी कभी कभी प्रेयसी तो कभी प्रियतम के रूप में तो कभी चेतन प्रकृति के रूप में देखता है। छायावादी कवि सृष्टि के कण-कण में इसी अज्ञात सत्ता की झलक पाता है। महादेवी जी ने अज्ञात प्रियतम के प्रति अपना प्रणय निवेदन इस प्रकार किया है----
" मैं कन- कन में ढाल रही हूं,
आंसू के मिस प्यार किसी का।
मैं पलकों में पाल रही हूं,
यह सपना सुकुमार किसी का"
इतना ही नहीं महादेवी जी का प्रियतम तो इतना निकट हो गया है कि परिचय पूछना भी व्यर्थ है----" तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या।"
४) वेदना और करुणा की अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति---- छायावाद में वेदना और करीना करुणा की अभिव्यंजना की प्रवृत्ति भी दृष्टिगत होती है । जन्म- मरण, विरह- मिलन, हास्य- रुदन से उत्पन्न विषमताओं से घिरे हुए मानव जीवन को देखते हुए कवि हृदय में वेदना और करुणा का पारावार उमड़ पड़ता है । मानव- हृदय की आकांक्षाओं, अभिलाषा ओं की विफलता पर वह करुण क्रंदन करने लगता है । ज्ञातव्य है कि छायावादी कवि सौंदर्य प्रेमी होता है किंतु सौंदर्य की क्षणभंगुर ता को देखकर उसका ह्रदय हहाकार कर उठता है।
प्रसाद जी लिखते हैं----
" सुनकर तुम क्या भला करोगे,
मेरी भोली आत्मकथा।
अभी समय भी नहीं थकी,
सोई है मेरी मौन व्यथा।।
कविवर पंत ने भी वेदना को काव्य का प्रमुख तत्व मानते हुए लिखा है----
" वियोगी होगा पहला कवि
आह से निकला होगा गान।
उमड़ कर आंखों में चुपचाप
बही होगी कविता अनजान।।"
कवियित्री महादेवी ने तो पीड़ा को अपने जीवन का अंग ही बना लिया है। पीड़ा उन्हें इतना प्रिय है कि वह अपने प्रिय को भी पीड़ा में ढूंढती है----
" तुमको पीड़ा में ढूंढा तुममें ढूढूंगी पीड़ा"
५ )प्रकृतिका मानवीकरण---- छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति प्रकृति का मानवीकरण है । छायावादी काव्य में प्रकृति चित्रण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।प्रकृति छायावाद के प्राणों में पाई जाती है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को अनेक रूपों में अपनाया है और उसमें वे समस्त भावनाएं प्रदर्शित की जाती हैं जो नर- नारी के जीवन में किसी भी प्रकार उत्पन्न हो सकती है । महाकवि निराला ने संध्या का सुंदरी के रूप में अत्यंत सुंदर सचिव सजीव चित्र खींचा है----
"देहावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या सुंदरी
परी सी धीरे! धीरे! धीरे!"
निराला की जूही की कली कविता में तो मलयानील और कलिन में प्रेम और छेड़छाड़ भी दिखाई गई है----
"विजन वल वलरी पर सोती थी सुहाग भरी
स्नेह स्वप्न मग्न अमल कोमल
तरुण तरुणी जूही की कली
दृग बंद किए शिथिल पत्रांक में"
कविवर प्रसाद ने भी प्रकृति को मानवीय रूप प्रदान किया है। "बीती विभावरी जाग री
अंबर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी।"
६) रहस्यात्मकता---- छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति रहस्यातमक भावना की अभिव्यंजना है। कुछ आलोचकों ने रहस्यवाद को छायावाद का प्राण कहा है। विश्व के अथाह प्रकृति के सभी उपादानों में चेतना का आरोप छायावाद की पहली सीढ़ी है। तो किसी असीम के प्रति अनुराग जनित आत्मा विसर्जन का भाव रहस्यवादी छायावाद की दूसरी सीढ़ी। ऐसा स्वयं छायावादी कवित्री महादेवी ने कहा है। छायावाद में रहस्य की प्रधानता का कारण भौतिकता के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। दिवेदी युग का विषय पार्थिव संसार था। अतः छायावादी कवियों ने उसके विरोध में आलोक को अपनाया। प्राचीन और नवीन रहस्यवाद में भी अंतर है। प्राचीन रहस्यवाद कवि धार्मिक भावना से आकृष्ट हुए और आधुनिकता रहस्यवादी कवि भावुकता और कल्पना की अधिकता के कारण स्मरणीय है। आधुनिक युग तर्क प्रधान है। कविवर पंत की 'मौन निमंत्रण' शीर्षक कविता में जिज्ञासा की अतिशय व्यंजना हुई है----
" तू मौन में जब एकाकार
ऊंघता जब एक साथ संसार
भीरू झींगुर कुल की झंकार
कंपा देती तंद्रा के तान।"
महादेवी जी अज्ञेय को जीवन की उत्कृष्ट और उत्कट अभिलाषा बतलाती हैं----
" तोड़ दो यह छितिज मैं भी देख लूं उस पार क्या है"
७ )राष्ट्रीय भावना की प्रवृत्ति---- छायावादी रचनाओं पर कतिपय आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि जिस समय स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था उस समय यह ' मैं' के गीत गा रहे थे, परंतु प्रसाद के गीतों जैसे----
" हिमाद्रि तुंग श्रृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती"
" अरुण यह मधुमय देश हमारा" या फिर निराला की "जागो फिर एक बार" कविता आदि को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीयतवादी भावना इन कवियों में भी प्रछन्न है। निराला जी आर्थिक दुर्दशा का कारण अंग्रेजों के शोषण नीति को बतलाते हुए साफ लिखते हैं----
" बानिज के राज ने लक्ष्मी को हर लिया।
टापू में ले चल कर रखा और कैद किया।।"
८)बौद्धिकता---- छायावादी रचनाओं की एक प्रमुख प्रवृत्ति बौद्धिकता है । निराला काव्य की सम्यक अनुशीलन से पता चलता है कि उनमें भावुकता से अधिक एक दार्शनिक का गूढ़ चिंतन है। जागो फिर एक बार में उनकी बौद्धिकता द्रस्त्व्य है----
" जागो फिर एक बार
पशु नहीं वीर तुम
समर सुर युद्ध नहीं
समर सुर क्रूर नहीं"
सचमुच आश्चर्य की बात है कि इतनी सारी उदात्त प्रवृत्तियों के रहते हुए भी छायावाद 20 ही वर्षों में चरमरा क्यों गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि छायावादी आदर्श उपयोगी नहीं थे।वस्तुत: आज के इस भौतिकता वादी युग में परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि कदम से कदम मिलाकर नहीं चलने पर गिरना अवश्यंभावी है। यही बात छायावाद के साथ भी है। फिर भी अभी छायावादीता पूरी तरह से मिटी नहीं है। नई कविता का दौर भले ही आ गया हो पर एक कोने से छायावाद की आवाज कभी कभी सुनाई पड़ी जाती है। भले ही यह छायावाद आज इतिहास की वस्तु बन गया हो पर उसके संबंध में इतना ही कहा जाएगा कि वह हिंदी काव्यधारा का ही स्वभाविक विकास था। जिसकी परिणति नई कविता है। इसने सौंदर्य और अटूट प्रेम का जो मंत्र फूंका वह विश्वव्यापी और सास्वत तत्व है। विश्व बंधुत्व और नव मानवता की भावना इसकी अक्षय निधि है। गांधी ने भी इसी के लिए गोलियां खाई थी। वह मर तो गया पर क्या मरकर भी अमर नहीं हो गया। छायावाद का स्वर भी अभी तक गूंज गूंज रहा है----
" हार बैठे जीवन का दाव
जीतते किसको मर कर वीर।"
समाप्त
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अनुराधा
शनिवार, 28 मार्च 2020
प्रगतिवाद क्या है तथा उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों का वर्णन
प्रगतिवाद क्या है?
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प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहित्यिक आंदोलन है जिसने जीवन और यथार्थ के कटु सत्य को उत्तर छायावाद में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहित्यिक चेतना को अग्रसर होने की प्रेरणा दी। प्रगतिवाद का उद्देश्य था----साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद को प्रतिष्ठित करना जो छायावाद की विकृतियों को नष्ट करके एक नई साहित्य और नए मानव की स्थापना की और सामाजिक सत्य के विभिन्न स्तरों को साहित्य में प्रतिपादित होने का अवसर प्रदान करें। वर्ग संघर्ष की साम्यवादी विचारधारा और उस संदर्भ में मानव की कल्पना इस साहित्य का उद्देश्य था। इसके मूल प्रेरणा मार्क्सवाद से विकसित हुई थी। इसका लक्ष्य था---- जनवादी शक्तियों को संगठित करके मार्क्सवाद और भौतिक यथार्थवाद के आधार पर निर्मित मूल्यों को प्रतिष्ठित करना । इसकी मूल स्थापना सिद्धांत रूप से प्रगतिशील थी इसलिए इस साहित्यिक आंदोलन को प्रगतिशील आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।
प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृतियां
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धर्म तथा रूढ़ियों का उच्छेद तथा यथार्थ चित्रण ----मार्क्सवाद का अनुयाई प्रगतिवादी कवि धर्म को अफीम की तरह घातक और विनाशकारी समझता है। ईश्वर, स्वर्ग, धर्म, नरक, आत्मा- परमात्मा आदि की बातें उसके लिए ढकोसला मात्र है । उसकी दृष्टि में व्यक्ति और समाज ही एकमात्र सत्य है। उसका मूल प्रतिपाद्य सामाजिक अर्थव्यवस्था है। वर्तमान की आंखों देखी की बात करता है। आदर्श से उसे चिढ़ है और वर्तमान पर ही उसकी आंखें गडी हैं। उसका विश्वास है कि भौतिक द्वंदके परिणाम स्वरुप ही इस सृष्टि का विकास हुआ है। वह विश्व के विभिन्न धर्मों और जातियों की कटु आलोचना करता है। मार्क्स की भांति ही वह मानवता को आर्थिक पलड़े पर तौलता है। वह देवी देवताओं की नहीं भौतिक समृद्धि की पूजा करता है। संघर्ष और क्रांति ही उसकी आस्था है। वह इसे ही सृष्टि विकास का मूल स्वीकार कर आगे बढ़ता है। प्रगतिवादी साहित्य कल्पना के स्वप्निल आकाश से उतरकर यथार्थ की खुरदरी भूमि पर खड़ा हुआ है। उच्च वर्गीय चकाचौंध की जगह गरीबों के भूखे नंगे बच्चों तथा नर नारियों के प्रति उसे विशेष सहानुभूति है।
शोषकों के प्रति आक्रोश और शोषितों के प्रति सहानुभूति----मार्क्सवादी सिद्धांतों के अनुरूप ही प्रगतिवाद भी वर्तमान युग को मजदूर वर्ग के उत्थान और पूंजीवाद में विनाश का युग मानता है । उसकी कविता का मूल स्वर है
" हो यह समाज चिथड़े - चीथड़े
शोषण पर जिसकी नींव पड़ी" ।
वर्तमान अर्थव्यवस्था के दावेदार पूंजीपतियों, सेठ, उद्योगपतियों के प्रति उसके मन में घोर आक्रोश है। वहीं उनपर डटकर प्रहार करता है और अपने क्रांतिकारी स्वरों से संपूर्ण व्यवस्था में उथल- पुथल मचा देना चाहता है।
" कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ
जिससे उथल-पुथल मची जाए" ।
प्रगतिवाद सर्वहारा वर्ग के हितों का रक्षक है। उसका दृढ़ विश्वास है कि जब तक इस संपूर्ण व्यवस्था का संपूर्ण विनाश नहीं होता है, मजदूर और किसान शोषित होते रहेंगे। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा चूस लिए गए भूखे- नंगे लोगों का वीभत्स चिंतन प्रगतिवाद का उद्देश्य है। निराला की बादल राग शीर्षक कविता का अंतिम खंड उदाहरणीय है जिसमें अस्थि पंजर किसान का दृश्य चित्रण है--
" जीर्ण बाहु है जीर्ण शरीर।
तुझे बुलाता कृषक अधीर।।
चूस लिया है उसका सार।
हार मात्र हीन है आधार।।"
सुख-सुविधाओं के सभी उपकरणों का निर्माता मजदूर उन से वंचित है और उन्हीं के खून पसीने से सिंचित धरती पर पूंजीपति वर्ग इठला-इठला कर राज्य कर रहा है। यह कैसी विडंबना है? प्रगतिवाद का सारा प्रयास मजदूरों के उत्थान और शोषकों के विनाश के लिए है।
नवीन परिवर्तन और क्रांति का आह्वान---- प्रगतिवाद संपूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की अमूल चूल परिवर्तन का हिमायती है । वह एक ऐसा वर्ग विहीन समाज की व्यवस्था करना चाहता है, जिसमें ना तो कोई शोषक हो और न ही कोई शोषित। इसके लिए वह मात्र वैचारिक क्रांति का ही नहीं अपितु खूनी क्रांति का भी समर्थन करता है। वह पुरातन के ध्वंस पर नवीन मानवता का निर्माण करना चाहता है।
नष्ट- भ्रष्ट हो जीन पुरातन।
ध्वंस- भ्रंश के जड़ बंधन ।।
पावक पग धर भाव नूतन।
हो पल्लवित नवल मानव पन।।
परिवर्तन का अग्रदूत यह कवि शोषित मानवता को भीषण संघर्ष और रक्तपात तक की सलाह देता है।
उ। " उठ समय मोर चाले
धूल धूसर वस्त्र मानव
देह के ही रक्त से तू
दे। देह के कपड़े रंगा ले"
विस्तृत मानवता एवं अंतर्राष्ट्रीय ता----- प्रगतिवाद का विषय है संपूर्ण मानवता एवं उसका कल्याण। वह मात्र भारत जैसे पूंजीवादी व्यवस्था वाले देश में ही क्रांति नहीं चाहता बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका भी उसकी दृष्टि पत्र में है। हिरोशिमा की बर्बादी के लिए जिम्मेवार अमेरिका को कोसते हुए प्रगतिवादी कवि कहता है----
" हिरोशिमा का शाप एक दिन
न्यूयार्क भी मेरी तरह हो जाएगा
जिसने मिटाया है मुझे वह
भी मिटाया जाएगा!"
संप्रदायिक दंगे, आकाश छूती महंगाई, बेकारी, झूठी नेतागिरी ,भुखमरी, टैक्सों के बढ़ते दबाव ए सब प्रकृति वादी प्रभाव के प्रमुख विषय हैं। लेकिन प्रगतिवाद इन सब को मात्र राष्ट्रीय धरातल पर नहीं अंतरराष्ट्रीय धरातल पर देखता है। संपूर्ण विश्व का शोषित वर्ग उसकी सहानुभूति का विषय है।
बौद्धिकता और यथार्थ का अतिरे य ---- प्रगतिवादी कवि विश्व की प्रत्येक घटना को अपनी खुली आंखों से देखता है । और उन्हें अपनी बुद्धि के पलड़े पर तोलता है। पूर्व आस्था और परंपराओं का वह अंधानुगाम नहीं है। बुद्धि और तर्क ही उसकी मान्यताओं की कसौटी है। यही कारण है कि मार्क्स के तर्कपूर्ण और यथार्थ सिद्धांतों का उपासक है। जो भी हो भारत जैसे स्वतंत्र उन्मुख देश को इनके यथार्थवादी चिंता ने एक और भी नवीन आलोकित पथ प्रदान किया जिस पर चलकर अपने देश की यह गति और भी तीव्र हो गई।
सामाजिक चिंतन और नारी संबंधी दृष्टिकोण----- प्रगति वाद समाज की वर्तमान दुर्दशा को पूंजी पतियों की देन मानता है । और उसका यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक जाति वर्ग और धर्म के सामाजिक बंधन समाप्त नहीं होंगे, अमन-चैन का वातावरण तैयार नहीं होगा। ये सभी बंधन विकसित मानवता की राह को अवरुद्ध करते हैं। प्रगतिवादी कवि का मानना है कि धर्म, जाति, वर्ग की उलझन में उलझा मनुष्य आगे की ओर देख नहीं पाता और उत्तरोत्तर शोषण का शिकार होता जाता है। नारी को भी प्रगतिवादी कविता शोषित और दलित मानता है इसी कारण उसकी मुक्ति के लिए भी स्वर बुलंद करता है " योनी नहीं है रे नारी
वह मानवी प्रतिष्ठित
उसे पूर्ण स्वाधीन करो
वह रहे न नर पर अवसित ।"
मार्क्स रूस चीन का उन्मुख गान तथा नारेबाजी का साहित्य---- प्रगतिवादी कवि मार्क्स को अपना गुरु मानता है। उसे रूस और चीन की साम्यवादी शासन व्यवस्था से प्रेरणा मिली है। लाल क्रांति उसका सबसे बड़ा नारा है। और उसके माध्यम से वह संपूर्ण विश्व में उथल-पुथल मचा देना चाहता है। जैसे साम्यवाद के मसीहा उसकी धर्मगुरु हैं। साम्यवादी समाज की स्थापना में उसे स्वर्णिम विहान दिखाई पड़ता है।
" साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग
करता मधुर पदार्पण
मुक्त निखिल मानवता करती
मानव का अभिवादन"
निष्कर्स पूंजी वादी अर्थव्यवस्थाके अंधकार में भटकते हुए मनुष्य को मार्क्स का साम्यवाद तृतीय प्रकाश मय नेत्र के रूप में मिला है। पंत जी मार्क्स की वंदना करते हुए कहा हैं----
" धन्य मार्क्स चिर तमा क्षण
पृथ्वी के उदय शिखर पर
तुम त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु से
प्रकट हुए प्रलयंकार"
प्रगति वादी कवि लाल रुष को अपने आदर्शों के जीवित रूप में देखता है। उसे ही भावी मानवता की सबसे बड़ी आशा समझता है।
फिर मिलेंगे.....btkhi.blogspot.com
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प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहित्यिक आंदोलन है जिसने जीवन और यथार्थ के कटु सत्य को उत्तर छायावाद में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहित्यिक चेतना को अग्रसर होने की प्रेरणा दी। प्रगतिवाद का उद्देश्य था----साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद को प्रतिष्ठित करना जो छायावाद की विकृतियों को नष्ट करके एक नई साहित्य और नए मानव की स्थापना की और सामाजिक सत्य के विभिन्न स्तरों को साहित्य में प्रतिपादित होने का अवसर प्रदान करें। वर्ग संघर्ष की साम्यवादी विचारधारा और उस संदर्भ में मानव की कल्पना इस साहित्य का उद्देश्य था। इसके मूल प्रेरणा मार्क्सवाद से विकसित हुई थी। इसका लक्ष्य था---- जनवादी शक्तियों को संगठित करके मार्क्सवाद और भौतिक यथार्थवाद के आधार पर निर्मित मूल्यों को प्रतिष्ठित करना । इसकी मूल स्थापना सिद्धांत रूप से प्रगतिशील थी इसलिए इस साहित्यिक आंदोलन को प्रगतिशील आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।
प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृतियां
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धर्म तथा रूढ़ियों का उच्छेद तथा यथार्थ चित्रण ----मार्क्सवाद का अनुयाई प्रगतिवादी कवि धर्म को अफीम की तरह घातक और विनाशकारी समझता है। ईश्वर, स्वर्ग, धर्म, नरक, आत्मा- परमात्मा आदि की बातें उसके लिए ढकोसला मात्र है । उसकी दृष्टि में व्यक्ति और समाज ही एकमात्र सत्य है। उसका मूल प्रतिपाद्य सामाजिक अर्थव्यवस्था है। वर्तमान की आंखों देखी की बात करता है। आदर्श से उसे चिढ़ है और वर्तमान पर ही उसकी आंखें गडी हैं। उसका विश्वास है कि भौतिक द्वंदके परिणाम स्वरुप ही इस सृष्टि का विकास हुआ है। वह विश्व के विभिन्न धर्मों और जातियों की कटु आलोचना करता है। मार्क्स की भांति ही वह मानवता को आर्थिक पलड़े पर तौलता है। वह देवी देवताओं की नहीं भौतिक समृद्धि की पूजा करता है। संघर्ष और क्रांति ही उसकी आस्था है। वह इसे ही सृष्टि विकास का मूल स्वीकार कर आगे बढ़ता है। प्रगतिवादी साहित्य कल्पना के स्वप्निल आकाश से उतरकर यथार्थ की खुरदरी भूमि पर खड़ा हुआ है। उच्च वर्गीय चकाचौंध की जगह गरीबों के भूखे नंगे बच्चों तथा नर नारियों के प्रति उसे विशेष सहानुभूति है।
शोषकों के प्रति आक्रोश और शोषितों के प्रति सहानुभूति----मार्क्सवादी सिद्धांतों के अनुरूप ही प्रगतिवाद भी वर्तमान युग को मजदूर वर्ग के उत्थान और पूंजीवाद में विनाश का युग मानता है । उसकी कविता का मूल स्वर है
" हो यह समाज चिथड़े - चीथड़े
शोषण पर जिसकी नींव पड़ी" ।
वर्तमान अर्थव्यवस्था के दावेदार पूंजीपतियों, सेठ, उद्योगपतियों के प्रति उसके मन में घोर आक्रोश है। वहीं उनपर डटकर प्रहार करता है और अपने क्रांतिकारी स्वरों से संपूर्ण व्यवस्था में उथल- पुथल मचा देना चाहता है।
" कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ
जिससे उथल-पुथल मची जाए" ।
प्रगतिवाद सर्वहारा वर्ग के हितों का रक्षक है। उसका दृढ़ विश्वास है कि जब तक इस संपूर्ण व्यवस्था का संपूर्ण विनाश नहीं होता है, मजदूर और किसान शोषित होते रहेंगे। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा चूस लिए गए भूखे- नंगे लोगों का वीभत्स चिंतन प्रगतिवाद का उद्देश्य है। निराला की बादल राग शीर्षक कविता का अंतिम खंड उदाहरणीय है जिसमें अस्थि पंजर किसान का दृश्य चित्रण है--
" जीर्ण बाहु है जीर्ण शरीर।
तुझे बुलाता कृषक अधीर।।
चूस लिया है उसका सार।
हार मात्र हीन है आधार।।"
सुख-सुविधाओं के सभी उपकरणों का निर्माता मजदूर उन से वंचित है और उन्हीं के खून पसीने से सिंचित धरती पर पूंजीपति वर्ग इठला-इठला कर राज्य कर रहा है। यह कैसी विडंबना है? प्रगतिवाद का सारा प्रयास मजदूरों के उत्थान और शोषकों के विनाश के लिए है।
नवीन परिवर्तन और क्रांति का आह्वान---- प्रगतिवाद संपूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की अमूल चूल परिवर्तन का हिमायती है । वह एक ऐसा वर्ग विहीन समाज की व्यवस्था करना चाहता है, जिसमें ना तो कोई शोषक हो और न ही कोई शोषित। इसके लिए वह मात्र वैचारिक क्रांति का ही नहीं अपितु खूनी क्रांति का भी समर्थन करता है। वह पुरातन के ध्वंस पर नवीन मानवता का निर्माण करना चाहता है।
नष्ट- भ्रष्ट हो जीन पुरातन।
ध्वंस- भ्रंश के जड़ बंधन ।।
पावक पग धर भाव नूतन।
हो पल्लवित नवल मानव पन।।
परिवर्तन का अग्रदूत यह कवि शोषित मानवता को भीषण संघर्ष और रक्तपात तक की सलाह देता है।
उ। " उठ समय मोर चाले
धूल धूसर वस्त्र मानव
देह के ही रक्त से तू
दे। देह के कपड़े रंगा ले"
विस्तृत मानवता एवं अंतर्राष्ट्रीय ता----- प्रगतिवाद का विषय है संपूर्ण मानवता एवं उसका कल्याण। वह मात्र भारत जैसे पूंजीवादी व्यवस्था वाले देश में ही क्रांति नहीं चाहता बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका भी उसकी दृष्टि पत्र में है। हिरोशिमा की बर्बादी के लिए जिम्मेवार अमेरिका को कोसते हुए प्रगतिवादी कवि कहता है----
" हिरोशिमा का शाप एक दिन
न्यूयार्क भी मेरी तरह हो जाएगा
जिसने मिटाया है मुझे वह
भी मिटाया जाएगा!"
संप्रदायिक दंगे, आकाश छूती महंगाई, बेकारी, झूठी नेतागिरी ,भुखमरी, टैक्सों के बढ़ते दबाव ए सब प्रकृति वादी प्रभाव के प्रमुख विषय हैं। लेकिन प्रगतिवाद इन सब को मात्र राष्ट्रीय धरातल पर नहीं अंतरराष्ट्रीय धरातल पर देखता है। संपूर्ण विश्व का शोषित वर्ग उसकी सहानुभूति का विषय है।
बौद्धिकता और यथार्थ का अतिरे य ---- प्रगतिवादी कवि विश्व की प्रत्येक घटना को अपनी खुली आंखों से देखता है । और उन्हें अपनी बुद्धि के पलड़े पर तोलता है। पूर्व आस्था और परंपराओं का वह अंधानुगाम नहीं है। बुद्धि और तर्क ही उसकी मान्यताओं की कसौटी है। यही कारण है कि मार्क्स के तर्कपूर्ण और यथार्थ सिद्धांतों का उपासक है। जो भी हो भारत जैसे स्वतंत्र उन्मुख देश को इनके यथार्थवादी चिंता ने एक और भी नवीन आलोकित पथ प्रदान किया जिस पर चलकर अपने देश की यह गति और भी तीव्र हो गई।
सामाजिक चिंतन और नारी संबंधी दृष्टिकोण----- प्रगति वाद समाज की वर्तमान दुर्दशा को पूंजी पतियों की देन मानता है । और उसका यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक जाति वर्ग और धर्म के सामाजिक बंधन समाप्त नहीं होंगे, अमन-चैन का वातावरण तैयार नहीं होगा। ये सभी बंधन विकसित मानवता की राह को अवरुद्ध करते हैं। प्रगतिवादी कवि का मानना है कि धर्म, जाति, वर्ग की उलझन में उलझा मनुष्य आगे की ओर देख नहीं पाता और उत्तरोत्तर शोषण का शिकार होता जाता है। नारी को भी प्रगतिवादी कविता शोषित और दलित मानता है इसी कारण उसकी मुक्ति के लिए भी स्वर बुलंद करता है " योनी नहीं है रे नारी
वह मानवी प्रतिष्ठित
उसे पूर्ण स्वाधीन करो
वह रहे न नर पर अवसित ।"
मार्क्स रूस चीन का उन्मुख गान तथा नारेबाजी का साहित्य---- प्रगतिवादी कवि मार्क्स को अपना गुरु मानता है। उसे रूस और चीन की साम्यवादी शासन व्यवस्था से प्रेरणा मिली है। लाल क्रांति उसका सबसे बड़ा नारा है। और उसके माध्यम से वह संपूर्ण विश्व में उथल-पुथल मचा देना चाहता है। जैसे साम्यवाद के मसीहा उसकी धर्मगुरु हैं। साम्यवादी समाज की स्थापना में उसे स्वर्णिम विहान दिखाई पड़ता है।
" साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग
करता मधुर पदार्पण
मुक्त निखिल मानवता करती
मानव का अभिवादन"
निष्कर्स पूंजी वादी अर्थव्यवस्थाके अंधकार में भटकते हुए मनुष्य को मार्क्स का साम्यवाद तृतीय प्रकाश मय नेत्र के रूप में मिला है। पंत जी मार्क्स की वंदना करते हुए कहा हैं----
" धन्य मार्क्स चिर तमा क्षण
पृथ्वी के उदय शिखर पर
तुम त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु से
प्रकट हुए प्रलयंकार"
प्रगति वादी कवि लाल रुष को अपने आदर्शों के जीवित रूप में देखता है। उसे ही भावी मानवता की सबसे बड़ी आशा समझता है।
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शुक्रवार, 20 मार्च 2020
जीवनी साहित्य
जीवनी साहित्य गद्य परंपरा की उत्कृष्ट विधा है। हिंदी में आधुनिक काल में बड़ी संख्या में जीवनिया लिखी गई हैं। कुछ विद्वान जीवनी और आत्मकथा को एक ही विधा के अंतर्गत स्वीकारते हैं किंतु दोनों भिन्न हैं। जीवनी अन्य के द्वारा तथा आत्मकथा स्वयं के द्वारा लिखी जाती है।
भारतेंदु युग से ही जीवनी साहित्य का उद्भव माना जाता है। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ जीवनिया मिलती हैं। कुछ विद्वानों ने कार्तिक प्रसाद खत्री द्वारा लिखित "मीराबाई"(1899) को हिंदी की प्रथम साहित्यिक जीवनी माना है । भारतेंदु युग में देवी प्रसाद मुंसिफ का नाम जीवनी लेखकों में विशेष लिया जाता है।जो जीवनी लिखी गई उसमें प्रमुख समाज सुधारक श्री भद्दयानंद सरस्वती पर लिखी गई जीवनिया ही प्रमुख है। भारतेंदु युग से जीवनी विधा का आरंभ और दिवेदी युग इसका सही अर्थों में परिष्कार स्वीकारना उचित होगा।
डॉ पदम सिंह शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद तथा निराला पर लिखित जीवनी को उत्कृष्ट जीवनी माना है। प्रेमचंद की जीवनी "कलम का सिपाही" नाम से उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है । दूसरी जीवनी के लेखक हैं रामविलास शर्मा नाम है "निराला की साहित्य साधना "इसीप्रकार विष्णु प्रभाकर कृत "आवारा मसीहा" शीर्षक से शरद चंद की जीवनी और भगवती प्रसाद कृत मनीषी की लोक यात्रा" में गोपीनाथ कविराज की जीवनी भी प्रकाशित हुई है, जिन्हें जीवनी साहित्य जगत के उज्जवल कीर्ति स्तंभ मान सकते हैं जो युग युग तक उदीप्त होकर जीवनी लेखकों के पथ को आलोकित करते रहेंगे।
निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में जीवनी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। जीवनी लेखन में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। यह नवीन साहित्य गद्य विधाएं पृथक होते हुए भी अनेक बार एक दसरे की पूरक प्रतीत होती है।
भारतेंदु युग से ही जीवनी साहित्य का उद्भव माना जाता है। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ जीवनिया मिलती हैं। कुछ विद्वानों ने कार्तिक प्रसाद खत्री द्वारा लिखित "मीराबाई"(1899) को हिंदी की प्रथम साहित्यिक जीवनी माना है । भारतेंदु युग में देवी प्रसाद मुंसिफ का नाम जीवनी लेखकों में विशेष लिया जाता है।जो जीवनी लिखी गई उसमें प्रमुख समाज सुधारक श्री भद्दयानंद सरस्वती पर लिखी गई जीवनिया ही प्रमुख है। भारतेंदु युग से जीवनी विधा का आरंभ और दिवेदी युग इसका सही अर्थों में परिष्कार स्वीकारना उचित होगा।
डॉ पदम सिंह शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद तथा निराला पर लिखित जीवनी को उत्कृष्ट जीवनी माना है। प्रेमचंद की जीवनी "कलम का सिपाही" नाम से उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है । दूसरी जीवनी के लेखक हैं रामविलास शर्मा नाम है "निराला की साहित्य साधना "इसीप्रकार विष्णु प्रभाकर कृत "आवारा मसीहा" शीर्षक से शरद चंद की जीवनी और भगवती प्रसाद कृत मनीषी की लोक यात्रा" में गोपीनाथ कविराज की जीवनी भी प्रकाशित हुई है, जिन्हें जीवनी साहित्य जगत के उज्जवल कीर्ति स्तंभ मान सकते हैं जो युग युग तक उदीप्त होकर जीवनी लेखकों के पथ को आलोकित करते रहेंगे।
निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में जीवनी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। जीवनी लेखन में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। यह नवीन साहित्य गद्य विधाएं पृथक होते हुए भी अनेक बार एक दसरे की पूरक प्रतीत होती है।
शुक्रवार, 13 मार्च 2020
रहस्यवाद क्या है???
विभिन्न आलोचकों ने रहस्यवाद की परिभाषा अलग-अलग तरह से दी है। जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हअनुसार---" जो चिंतन के क्षेत्र में अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है ।"
गंगा प्रसाद पांडे----" रहस्यवाद हृदय की वह दिव्य अनुभूति है जिसके भवावेश में प्राणी अपने असीम और पार्थिव अस्तित्व से उस असीम एवं स्वर्गिक महाअस्तित्व के साथ एकात्मकता का अनुभव करने लगता है।"
डॉ रामकुमार वर्मा रहस्यवाद जीवात्मा की दिव्य और अलौकिक शक्ति से अपना संत और निश्चल संबंध जोड़ना चाहता है और यह संबंध यहां तक बढ़ जाता है कि दोनों में अंतर नहीं रह जाता
गंगा प्रसाद पांडे----" रहस्यवाद हृदय की वह दिव्य अनुभूति है जिसके भवावेश में प्राणी अपने असीम और पार्थिव अस्तित्व से उस असीम एवं स्वर्गिक महाअस्तित्व के साथ एकात्मकता का अनुभव करने लगता है।"
डॉ रामकुमार वर्मा रहस्यवाद जीवात्मा की दिव्य और अलौकिक शक्ति से अपना संत और निश्चल संबंध जोड़ना चाहता है और यह संबंध यहां तक बढ़ जाता है कि दोनों में अंतर नहीं रह जाता
मंगलवार, 10 मार्च 2020
हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
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हिंदी कहानी का वास्तविक समारंभ कब हुआ यह विषय आज भी विवादास्पद है। वैसे कहानी सुनने सुनाने की परंपरा का वास्तविक प्रारंभ द्विवेदी युग'सरस्वती' पत्रिका(1900) से मान्य है
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हिंदी कहानी का वास्तविक समारंभ कब हुआ यह विषय आज भी विवादास्पद है। वैसे कहानी सुनने सुनाने की परंपरा का वास्तविक प्रारंभ द्विवेदी युग'सरस्वती' पत्रिका(1900) से मान्य है
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ श्रीकांत लाल और डॉक्टर गणपति चंद्र गुप्त ने इंदुमती कहानी को प्रथम मौलिक कहानी स्वीकार किया है।हिं
कहानी के विकास को तीन भागों में बांट सकते हैं
क़) पूर्व प्रेमचंद युग ( सन उन्नीस सौ से 1916 तक)
ख) प्रेमचन्द युग ( सन 1916 से 1936 तक )
ग) उत्तर प्रेमचंद युग(सन 1936 से 1950 तक) 1990 में इंदु पत्रिका का प्रकाशन हिंदी कहानी साहित्य के लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि इसी के माध्यम से श्री जयशंकर प्रसाद कहानी जगत में अवतरित हुए उनकी ग्राम और रसिया बालम 1912 इंदु में ही छपी थी स ।1915 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी कृत् 'उसने कहा था 'कहानी प्रकाश में आई जो अपने सहज पुलकित रसो द्रेक के कारण हिंदी कहानी साहित्य का स्तंभ बन गए ।हिंदी कहानियों में जो लोकप्रियता और अमरत्व 'उसने कहा था 'को प्राप्त है वह हिंदी की किसी कहानी को नहीं। सन1916 में मुंशी प्रेमचंद जी की 'पंच परमेश्वर 'कहानी प्रकाशित हुई । प्रेमचंद का प्रादुर्भाव हिंदी कहानी साहित्य की सबसे अद्भुत घटना थी ।जीवन का कोई पक्ष नहीं था जिसका उन्होंने स्पर्श न किया हो केवल मनोरंजन के लिए काल्पनिक कहानियों की रचना नहीं की बल्कि उनकी कहानियों में जीवन के प्रति दृष्टिकोण, एक सुझाव और समस्या का समाधान विद्यमान है। पूस की रात, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआं कहानियों को दृष्टि में रखते हुए इन्हें युग प्रवर्तक कहानीकार माना जाता है ।
प्रेमचंद युग के दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ श्री जयशंकर प्रसाद हैं। उनकी 69 कहानियां क्रमशः छाया, प्रतिध्वनि,आकाशदीप आंधी,और इंद्रजाल में संकलित है। इनकी अधिकांश कहानियां प्रेम कहानियां है किंतु उसमें रोमांस का जो स्वर है वह स्वस्थ और कलात्मक है उत्तेजक नहीं
प्रेमचंद के बाद कहानी लेखन में अनेक बदलाव आए मुख्यतः दो धाराएं सामने आई पहला प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वाली धारा दूसरा मनोविश्लेषणात्मक कहानी
प्रेमचंद परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में यशपाल ,अमृतराय ,रंगे राघव, उपेंद्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर ,उग्र, प्रभाकर मच्वे आदि उल्लेखनीय हैं। इन सभी कहानी कारों पर कमोवेश पाश्चात्य दर्शन मार्क्सवाद का प्रभाव है ।
दूसरी कहानी साहित्य धारा के लेखकों में जिनेंद्र, इलाचंद्र जोशी और अन्य प्रमुख हैं। जैनेंद्र में एक और भारतीय दर्शन का आग्रह है तो दूसरी और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से चरित्र चित्रण की प्रेरणा। नए-नए सिल्क में कहानियां लिखने का हिंदी में पहली बार इन्होंने ही प्रारंभ किया। आगे की कहानियों में व्यक्ति का अहम प्रबल रूप में है। इस युग की कहानियां एक और सामाजिक यथार्थ के प्रति सचेत है, तो दूसरी ओर व्यक्ति के मन की गहराइयों का संस्पर्श करने वाली व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक या भाव प्रधान है।
मेरा ये पहला ब्लॉग है। मेरा ये ब्लॉग आपको कैसा लगा। जरुर बताइएगा तथा लाइक, शेअर तथा फ़ॉलो भी कीजिए।
अनुराधा
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